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भावुक सफाई

काफी किरकिरी झेलने के बाद ललित मोदी प्रकरण में विदेशमंत्री सुषमा स्वराज संसद में सफाई देने उतरीं, पर संतोषजनक बात नहीं कह पार्इं। पूरे मामले को उन्होंने भावुक मोड़ देने की कोशिश की और अपने पहले के बयान से अलग रुख दिखाया। उनकी दलील थी कि उन्होंने ललित मोदी की मदद के लिए नहीं, बल्कि […]

Author August 9, 2015 4:48 PM
विदेश मंत्री सुषमा स्वराज (पीटीआई फोटो)

काफी किरकिरी झेलने के बाद ललित मोदी प्रकरण में विदेशमंत्री सुषमा स्वराज संसद में सफाई देने उतरीं, पर संतोषजनक बात नहीं कह पार्इं। पूरे मामले को उन्होंने भावुक मोड़ देने की कोशिश की और अपने पहले के बयान से अलग रुख दिखाया। उनकी दलील थी कि उन्होंने ललित मोदी की मदद के लिए नहीं, बल्कि उनकी पत्नी की गंभीर बीमारी को ध्यान में रख कर मानवीय आधार पर मौखिक सिफारिश की थी कि अगर ब्रिटिश सरकार ललित मोदी को यात्रा की इजाजत देती है, तो इससे भारत के साथ उसके संबंधों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

अच्छी बात है कि पिछले कई दिनों से चल रहे नाटकीय आरोप-प्रत्यारोप का सुर पकड़ कर विपक्ष पर हमला करने के बजाय उन्होंने शालीन तरीके से बयान दिया। पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से सवाल भी पूछ लिया कि अगर वे उनकी जगह होतीं तो क्या एक महिला को इस तरह असहाय छोड़ देतीं! विचित्र है कि जिस समय उन्होंने लोकसभा में यह बयान दिया विपक्ष लगभग नदारद था।

सवाल है कि उन्होंने अपनी सफाई के लिए ऐसा समय क्यों चुना। फिर यह भी कि एक दिन पहले जब अदालत ने धन शोधन के आरोप में चल रहे मुकदमे के तहत ललित मोदी के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया, उसके बाद सुषमा स्वराज भी सदन में अपना पक्ष रखने उतरीं। उनके बयान में भावुक टिप्पणी के अलावा ऐसा कुछ नहीं था, जिससे उन्हें दोषमुक्त समझा जा सके। स्वाभाविक ही विपक्ष पर उसका कोई असर नहीं पड़ा।

दरअसल, संसद में लगातार हंगामे की वजह से सरकार के कामकाज में बाधा पहुंच रही है। पहले तो उसने सोचा कि कांग्रेस के खिलाफ अनियमितताओं के पिटारे खोल कर वह मामले को शांत कर सकती है, पर यह उपाय काम नहीं आया। जब सरकार की मुश्किलें बढ़ती गई हैं, तो उसने सुषमा स्वराज के बयान के जरिए विपक्ष का उबाल रोकने का प्रयास किया।

मगर विपक्ष के इस तर्क को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि सरकार इस प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने के बजाय संसद में बहस के जरिए मामले को रफा-दफा क्यों करना चाहती है। अगर सुषमा स्वराज सचमुच निर्दोष हैं, तो उन्हें इस तरह भावनापूर्ण बयान देने के बजाय अडिग भाव से अपने खिलाफ जांच कराने की पेशकश करनी चाहिए थी। पूछा जा सकता है कि पहले इस तरह और कितने मामलों में मदद पहुंचाई गई। पहले खुद सुषमा स्वराज ने कहा था कि ललित मोदी को अपनी पत्नी से मिलने जाने देने के लिए यात्रा की इजाजत देने की उन्होंने सिफारिश की थी।

अब वे उसी बात को पलट कर कह रही हैं कि उन्होंने ललित मोदी की पत्नी की मदद की मंशा से मानवीय आधार पर ऐसा किया। आखिर दोनों बातों से यही साबित होता है कि उन्होंने किसी न किसी रूप में मदद पहुंचाई। वे भले दलील दें कि मोदी के खिलाफ चल रहे मुकदमे को प्रभावित करने के मकसद से ऐसा नहीं किया, पर आखिर जो किया उसे किस तरह कानून की नजर में उचित कहा जा सकता है!

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