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किराए की कोख

सरोगेसी यानी किराए की कोख से बच्चा पैदा करने को लेकर स्पष्ट कानून न होने की वजह से भारत में कई तरह की मुश्किलें पेश आ रही हैं। विदेशों से भ्रूण आयात करने और विदेशियों..

Author नई दिल्ली | Published on: October 30, 2015 12:06 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

सरोगेसी यानी किराए की कोख से बच्चा पैदा करने को लेकर स्पष्ट कानून न होने की वजह से भारत में कई तरह की मुश्किलें पेश आ रही हैं। विदेशों से भ्रूण आयात करने और विदेशियों को भी किराए पर कोख लेने की इजाजत होने की वजह से यहां सरोगेसी एक तरह से धंधे का रूप ले चुकी है। एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के पूछने पर अब केंद्र सरकार ने कहा है कि वह किराए की कोख को कारोबार बनने से रोकने का उपाय करेगी। बहुत सारे देशों में किराए की कोख से बच्चा पैदा करने पर पूरी तरह प्रतिबंध है।

अमेरिका, ब्रिटेन जैसे कुछ देशों में इसकी इजाजत जरूर है, मगर वहां किराए की कोख लेना खासा महंगा है। भारत में चूंकि गरीबी के चलते किराए पर बच्चा जनने को औरतें आसानी से मिल जाती हैं, अनेक देशों से लोग यहां आकर सरोगेसी के जरिए बच्चा हासिल करने लगे हैं। मगर मुश्किल यह है कि इस प्रक्रिया में कोई महिला कितनी बार अपनी कोख किराए पर दे सकती है, उसके स्वास्थ्य का समुचित ध्यान रखा जाता है या नहीं, उससे पैदा होने वाले बच्चे की नागरिकता क्या हो, अगर बच्चा अपंग पैदा हुआ और कोख किराए पर लेने वाला दंपति उसे अपनाने से इनकार कर गया या प्रसव के दौरान मां का देहांत हो गया, आदि स्थितियों की बाबत स्पष्ट कानूनी प्रावधान नहीं हैं। कई मामलों में सरोगेसी से पैदा बच्चे की नागरिकता को लेकर कानूनी अड़चनें पैदा हो चुकी हैं। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय की चिंता समझी जा सकती है।

किराए की कोख एक तरह से दो पक्षों के बीच आपसी करार के तहत ली या दी जाती है। इसमें महिला के स्वास्थ्य, बच्चे की जिम्मेदारी आदि को लेकर करार किया जाता है। चूंकि भारत में किराए की कोख देने वाली ज्यादातर महिलाएं गरीब और निम्न तबके की होती हैं, उनमें से बहुतों को करार संबंधी कानूनी पहलुओं की जानकारी नहीं होती। इसलिए यह खतरा हमेशा बना रहता है कि सरोगेसी के नाम पर उनका यौन शोषण किया जा सकता है। फिर ज्यादातर मामलों में समाज से लुक-छिप कर किराए की कोख ली और दी जाती है, इसलिए भी सरोगेट मां के साथ धोखाधड़ी की आशंका रहती है। प्रसव में सहायक अस्पताल और नर्सिंग होम जमकर कमीशन खाते हैं और अनेक मामलों में करार की ज्यादातर राशि वही हड़प कर जाते हैं। कई देशों में सरोगेसी पर प्रतिबंध है। अगर वहां के नागरिक भारत में किराए की कोख से बच्चा हासिल करते हैं तो उसकी नागरिकता पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा हो जाता है।

दरअसल, सरोगेसी से पैदा बच्चे की नागरिकता पेचीदा मामला है। इसलिए आठ यूरोपीय देशों- जर्मनी, फ्रांस, पोलैंड, चेक गणराज्य, इटली, नीदरलैंड, बेल्जियम और स्पेन- ने भारत सरकार को लिखा था कि वह अपने डॉक्टरों को निर्देश दे कि अगर कोई दंपति सरोगेसी के जरिए औलाद पाने का रास्ता अपनाता है, तो उन्हें संबंधित दूतावास की इजाजत के बगैर इस प्रक्रिया से न गुजरने दिया जाए। सरोगेसी के बढ़ते चलन और इसके चलते महिलाओं के स्वास्थ्य, सुरक्षा आदि के खतरों के मद्देनजर कुछ राज्यों के महिला आयोग भी सरकार से सिफारिश कर चुके हैं कि वह इस दिशा में स्पष्ट कानून बनाए। सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद उम्मीद जगी है कि सरकार इस मामले में अनिश्चितता समाप्त करने के कदम उठाएगी।

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