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संपादकीय: ताकत का करार

भारत ने रूस के साथ जो रक्षा करार किए हैं, उसके दूरगामी संकेत हैं। भारत के इस साहसपूर्ण फैसले से यह साफ हो गया है कि वह किसी देश का पिछलग्गू बन कर नहीं रहेगा। अपनी सुरक्षा के लिए भारत को क्या फैसले करने हैं और क्या नहीं, इसका निर्णय वह किसी के दबाव में आकर नहीं करेगा।

Author October 6, 2018 1:29 AM
भारत-रूस शिखर बैठक के पहले ही दिन दोनों देशों के बीच दस अरब डॉलर से ज्यादा के आठ बड़े समझौतों पर दस्तखत हुए।

रूस अब भारत को बेझिझक एस-400 वायु रक्षा प्रणाली देगा। भारत ने अमेरिका की तमाम आपत्तियों और दबाव को दरकिनार करते हुए रूस के साथ इस प्रणाली को खरीदने के लिए समझौते पर दस्तखत कर दिए हैं। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन दो दिन की भारत यात्रा पर हैं। भारत-रूस शिखर बैठक के पहले ही दिन दोनों देशों के बीच दस अरब डॉलर से ज्यादा के आठ बड़े समझौतों पर दस्तखत हुए। इनमें सबसे बड़ा पांच अरब डॉलर का करार एस-400 वायु रक्षा प्रणाली की खरीद का है। यह समझौता अमेरिकी दादागीरी को भारत का जोरदार झटका है। रूस भारत का पुराना सहयोगी रहा है और भारत की थल सेना, वायु सेना और नौसेना को मजबूत बनाने में उसकी बड़ी भूमिका रही है। यह करार दोनों देशों के बीच रक्षा क्षेत्र में नए युग की शुरुआत है। भारत को जिस तरह से चीन और पाकिस्तान के साथ सीमाओं पर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, उसे देखते हुए एस-400 वायु रक्षा प्रणाली अत्यावश्यक हो गई थी। इसमें दो राय नहीं कि इससे रक्षा तंत्र को मजबूत करने में काफी मदद मिलेगी। रूस ने भारत को आतंकवाद से निपटने में भी मदद देने का भरोसा दिया है।

भारत ने रूस के साथ जो रक्षा करार किए हैं, उसके दूरगामी संकेत हैं। भारत के इस साहसपूर्ण फैसले से यह साफ हो गया है कि वह किसी देश का पिछलग्गू बन कर नहीं रहेगा। अपनी सुरक्षा के लिए भारत को क्या फैसले करने हैं और क्या नहीं, इसका निर्णय वह किसी के दबाव में आकर नहीं करेगा। भारत ने रूस के साथ करार करके अमेरिका को यह जता दिया है कि वह उसके कहने पर चलने वाला नहीं। भारत के इस फैसले से दुनियाभर में एक कूटनीतिक संदेश यह भी गया है कि भारत की विदेश नीति कहीं से ढुलमुल या कमजोर नहीं है। चाहे रूस हो या अमेरिका या फिर चीन, सभी से रिश्तों में सद्भाव और संतुलन की झलक हमारी विदेश नीति में मिलेगी। अमेरिका ने पिछले साल एक कानून बनाया था जिसके तहत उसने अपने सहयोगी देशों को रूस, ईरान और उत्तर कोरिया जैसे देशों के साथ किसी भी तरह का व्यापार और समझौते नहीं करने की चेतावनी दे रखी है। ‘काउंटरिग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शन एक्ट’ (सीएसएसटीएसए) नाम के इस कानून का जो भी देश उल्लंघन करेगा वह अमेरिकी दंड का भागी होगा। यही चेतावनी अमेरिका ने भारत को भी दी है। इतना ही नहीं, चार नवंबर के बाद ईरान से तेल खरीद भी बंद कर देने को कहा है।

अमेरिका शुरू से ही पाकिस्तान पर अपना वरदहस्त बनाए हुए है और उसे हथियार, सैन्य और आर्थिक मदद तक देता आया है। जबकि पाकिस्तान इसका इस्तेमाल कैसे करता है, यह अमेरिका भलीभांति जानता है। लेकिन पिछले तीन दशकों में अमेरिका ने ऐसा कोई बड़ा कदम नहीं उठाया जो पाकिस्तान को भारत में आतंकवाद फैलाने से रोक पाया हो। एस-400 वायु रक्षा प्रणाली की खरीद से अमेरिका की हवा खराब इसलिए है कि यह दुनिया की सबसे अत्याधुनिक मिसाइल रक्षा प्रणाली है। भारत के इस शक्ति से लैस होने से पाकिस्तान भी परेशान है। यों पिछले डेढ़ दशक में भारत के अमेरिका के साथ भी रिश्ते काफी मजबूत हुए हैं, खासतौर से रक्षा और एटमी ऊर्जा के क्षेत्र में। इसके अलावा अमेरिका के आइटी उद्योग में भारत का बड़ा योगदान रहा है। ऐसे में भारत ने रूस और अमेरिका दोनों को साथ लेकर चलने की जो रणनीति बनाई है, वह न केवल इन देशों से रिश्तों के, बल्कि शक्ति संतुलन के लिहाज से भी महत्त्वपूर्ण है।

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