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श्रीलंका के साथ

आमतौर पर किसी देश में सत्ता परिवर्तन से घरेलू नीतियों में कितना भी बदलाव हो, विदेश नीति अमूमन वही रहती है। फिर भी पिछले महीने श्रीलंका के राष्ट्रपति का पदभार संभालने वाले मैत्रीपाला सिरिसेना की भारत यात्रा दोनों देशों के रिश्तों में एक नया मोड़ है। इसलिए कि पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे के कार्यकाल में […]

Author February 18, 2015 1:23 PM

आमतौर पर किसी देश में सत्ता परिवर्तन से घरेलू नीतियों में कितना भी बदलाव हो, विदेश नीति अमूमन वही रहती है। फिर भी पिछले महीने श्रीलंका के राष्ट्रपति का पदभार संभालने वाले मैत्रीपाला सिरिसेना की भारत यात्रा दोनों देशों के रिश्तों में एक नया मोड़ है। इसलिए कि पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे के कार्यकाल में श्रीलंका का काफी झुकाव चीन की तरफ था; श्रीलंका में सबसे ज्यादा बाहरी निवेश भी चीन का ही है। यही नहीं, राजपक्षे के कार्यकाल के उत्तरार्ध में भारत और श्रीलंका के संबंधों में कई बार तनाव की स्थिति भी पैदा हुई। इसके बरक्स सिरिसेना की इस यात्रा को देखें तो इसकी अहमियत साफ दिखती है। राष्ट्रपति के रूप में अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए उन्होंने भारत को चुना। इससे पहले उनके विदेशमंत्री भारत आ चुके थे। सिरिसेना के भारत रवाना होने से पहले श्रीलंका के विदेशमंत्री अमेरिका के विदेशमंत्री से मुलाकात कर लौटे थे। क्या सिरिसेना की भारत यात्रा में अमेरिका की भी दिलचस्पी होगी? जो हो, इतना साफ है कि श्रीलंका के नए राष्ट्रपति ने जहां भारत से रिश्ते सुधारने की पहल की है वहीं पश्चिमी देशों से खटास मिटाने की कोशिश भी।

महिंदा राजपक्षे श्रीलंकाई तमिलों के मानवाधिकार के मसले पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की आलोचना और अंतरराष्ट्रीय जांच के प्रस्तावों का सामना करने के लिए भी चीन और रूस की तरफ झुकते गए थे। श्रीलंका पर चीन का कूटनीतिक और आर्थिक प्रभाव निर्णायक रूप से कम हो जाएगा, इस बारे में कुछ कहना जल्दबाजी होगी। पर यह जाहिर है कि सिरिसेना, राजपक्षे के विपरीत, अपनी विदेश नीति को अधिक संतुलित बनाने में लगे हैं। उनका भारत आना इसी दिशा में पहला मुकाम है। साथ ही यह दोनों देशों के संबंधों को और बेहतर बनाने की भी कवायद है। आपसी संबंधों में एक बड़ी उलझन दोनों तरफ मछुआरों के खिलाफ होने वाली कार्रवाई रही है। दोनों देशों को एक ऐसा तंत्र विकसित करना होगा जो ऐसी शिकायतों का सौहार्दपूर्ण निपटारा कर सके और मछुआरों के उत्पीड़न के सिलसिले का खात्मा हो। एक दूसरा अहम मुद््दा श्रीलंकाई तमिलों के पुनर्वास और उनकी स्वायत्तता का रहा है। यों राजपक्षे सरकार भी इस मामले में सकारात्मक भाषा बोलती रही, पर उसने संविधान के तेरहवें संशोधन पर अमल नहीं किया। उम्मीद की जानी चाहिए कि सिरिसेना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बनी सहमति के मुताबिक इस लंबित काम को पूरा करेंगे। श्रीलंका से मुक्त व्यापार समझौता यूपीए सरकार के समय ही हो चुका है।

सिरिसेना की इस यात्रा के दौरान आपसी व्यापार को और बढ़ाने की रजामंदी केअलावा असैन्य परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर हुए। एक त्रिपक्षीय समुद्री सहयोग समझौते पर भी सहमति बनी, जिसमें तीसरा ध्रुव मालदीव होगा। दोनों देशों ने चार अन्य समझौतों पर भी हस्ताक्षर किए जिनमें कृषि के क्षेत्र में सहयोग शामिल है। एक समझौते के तहत, नालंदा विश्वविद्यालय परियोजना में श्रीलंका हिस्सा ले सकेगा। परमाणु समझौते के तहत ज्ञान और विशेषज्ञता के आदान-प्रदान, संसाधन की साझेदारी, कर्मियों के प्रशिक्षण और कचरा प्रबंधन जैसे सहयोग किए जाएंगे। यों श्रीलंका की इस क्षेत्र में कोई विशेषज्ञता नहीं है, और भारत को भी र्इंधन, तकनीक आदि मामलों में पश्चिमी देशों की मदद की तरफ देखना पड़ता है। पर असैन्य परमाणु समझौता भारत और श्रीलंका के बीच बढ़ी नजदीकी की रणनीतिक अहमियत की ओर संकेत करता है। सिरिसेना के निमंत्रण पर विदेशमंत्री सुषमा स्वराज और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले महीने श्रीलंका जाएंगे। इस तरह ढाई दशक में पहली बार भारत के किसी प्रधानमंत्री का श्रीलंका-दौरा होगा। कहना न होगा कि उस अवसर पर आपसी रिश्तों को और मजबूती मिलेगी।

 

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