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मैदान में समर्पण

मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में दक्षिण अफ्रीका के साथ हुए एकदिवसीय मैच में भारत ने न सिर्फ शृंखला गंवा दी, बल्कि इसकी जिस तरह की हार हुई, वह हैरान कर देने वाली है..

Author नई दिल्ली | October 27, 2015 5:56 PM
महेंद्र सिंह धोनी। (फाइल फोटो)

यों हार-जीत किसी भी खेल का अनिवार्य हिस्सा होती है और इसे खेल-भावना के साथ ही स्वीकार किया जाना चाहिए। लेकिन रविवार को मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में दक्षिण अफ्रीका के साथ हुए एकदिवसीय मैच में भारत ने न सिर्फ शृंखला गंवा दी, बल्कि इसकी जिस तरह की हार हुई, वह हैरान कर देने वाली है।

ऐसा लग रहा था कि एक पूरी तरह कुशल और सक्षम टीम के सामने नौसिखुए बच्चों की टीम खेल रही थी, जिसे अभी बहुत कुछ सीखना है। जबकि मौजूदा भारतीय टीम के कई खिलाड़ियों को वैश्विक स्तर का माना जाता है और इसे लगभग हर मौके पर उन्होंने साबित भी किया है। फिर वे क्या वजहें हो सकती हैं कि पहले बल्लेबाजी करने वाली दक्षिण अफ्रीका की टीम के सामने भारत के खिलाड़ी मैदान पर पूरी तरह लाचार नजर आए।

भारतीय टीम की गेंदबाजी से लेकर क्षेत्ररक्षण तक की हालत यह थी कि बल्लेबाजी कर रहे खिलाड़ियों के सामने जैसे रन परोसे जा रहे थे और उन्हें आउट होने के मौकों से बचाया जा रहा था। शुरू में ही हाशिम अमला और क्विंटन डी कॉक की जोड़ी ने भारतीय गेंदबाजों की बुरी तरह धुनाई की और इसका असर आखिर तक बना रहा। गेंदबाजी में ढिलाई के अलावा रही-सही कसर भारतीय टीम ने कम से कम छह कैच छोड़ कर पूरी कर दी!

नतीजतन, दक्षिण अफ्रीका ने महज चार विकेट गंवा कर चार सौ अड़तीस रन बनाए। रनों का यह पहाड़ अपने आप में किसी भी टीम पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए काफी है। लेकिन भारतीय बल्लेबाजी ने जिस तरह का समर्पण कर दिया, वह चौंकाने वाला था। छत्तीसवें ओवर में ही महज दो सौ चौबीस रन बना कर भारतीय टीम पवेलियन लौट गई। क्या यह एक ऐसी टीम का प्रदर्शन लगता है जिसके नाम अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की सबसे बड़ी कामयाबियां दर्ज हैं?

यह जगजाहिर है कि कुछ खेलों को राष्ट्रीय मान-सम्मान के साथ जोड़ कर देखा जाने लगा है। भारत और क्रिकेट खेलने वाले अन्य देशों में भी इस खेल को लेकर जो दीवानगी है, उसने इसे ज्यादा अहम बना दिया है। कुछ साल पहले तक क्रिकेट पांच दिवसीय टेस्ट और एकदिवसीय मैचों की शृंखलाओं, त्रिकोणीय, शरजाह कप या विश्वकप जैसी प्रतियोगिताओं के जरिए फल-फूल रहा था। लेकिन बढ़ती लोकप्रियता के साथ ज्यों-ज्यों इसमें बाजार घुसता गया, इसकी रफ्तार बहुत तेज होती गई है। अब यह टी-20 मुकाबलों और आइपीएल की शक्ल में भी सामने है, जिसने क्रिकेट को पैसे का तमाशा बना दिया है।

दूसरे देश की टीम के खिलाफ अपने देश की ओर से खेलते हुए जो खिलाड़ी अक्सर खराब प्रदर्शन करते दिखते हैं, वही आइपीएल में कई करोड़ रुपए में खरीदे जाने के बाद अच्छा प्रदर्शन करते हैं। सवाल है कि आइपीएल मैचों के लिए जिस तरह खिलाड़ियों की नीलामी या खरीद-बिक्री होने लगी है, उसमें क्रिकेट कितना खेल रह गया है? क्या बाजार के हवाले होते जा रहे किसी भी खेल में हम खेल-भावना के भी बचे रहने की उम्मीद कर सकते हैं? क्या इस रफ्तार और होड़ का असर क्रिकेट की सहजता और स्वभाव पर नहीं पड़ रहा है?

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