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संपादकीय: सचल वित्त

डाकघरों का काम मुख्य रूप से चिट्ठियां और छोटी राशि वाले मनीआर्डर वगैरह लोगों तक पहुंचाना रहा है। पर अब चिट्ठियों आदि के लिए अनेक तरह की तकनीकी और निजी सेवाएं शुरू हो जाने से इनका चलन कम हो गया है। इसी तरह इंटरनेट बैंकिंग और धन हस्तांतरण की त्वरित सुविधाएं आने से मनीआर्डर सेवा का भी कम ही लोग इस्तेमाल करते हैं।

Author August 31, 2018 2:18 AM
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस सेवा के लिए एक हजार चार सौ पैंतीस करोड़ रुपए की मंजूरी दे दी है।

बैंक सेवाओं तक आम लोगों की पहुंच सुनिश्चित करने की मंशा से केंद्र ने डाकघरों को भी बैंकों की तरह काम करने की सुविधा प्रदान करने की घोषणा की थी। अब वह सेवा शुरू होने जा रही है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस सेवा के लिए एक हजार चार सौ पैंतीस करोड़ रुपए की मंजूरी दे दी है। अब अगले महीने से डाकघर बैंकों की तरह काम करना शुरू कर देंगे। उनमें कर्ज के लेन-देन के अलावा बैंकों से संबंधित लगभग सभी सुविधाएं उपलब्ध होंगी। एक लाख रुपए तक का लेन-देन संभव हो सकेगा। इस योजना की शुरुआत में देश भर में साढ़े छह सौ शाखाएं और सवा तीन हजार ऐसे केंद्र शुरू हो जाएंगे, जहां से लोग सेवाओं का लाभ उठा सकेंगे। आगे चल कर देश भर में कुल डाकघरों की संख्या बढ़ कर दो गुनी हो जाएगी। अब डाक कर्मचारी सचल बैंककर्मी का भी दायित्व निभा सकेंगे। अभी तक डाकघरों की मार्फत लोग आमतौर पर धनादेश यानी मनीआर्डर वगैरह भेज अथवा प्राप्त या छोटी राशि जमा कर पा रहे थे, पर अब उनमें बैंकों की तरह खाते खुलवा कर न सिर्फ बचत संबंधी सेवाओं का लाभ उठा सकेंगे, बल्कि सरकारी योजनाओं के लाभ भी प्राप्त करेंगे। यह निस्संदेह दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में रहने और छोटी आमदनी वाले लोगों के लिए लाभकारी सुविधा होगी।

यों डाकघरों का काम मुख्य रूप से चिट्ठियां और छोटी राशि वाले मनीआर्डर वगैरह लोगों तक पहुंचाना रहा है। पर अब चिट्ठियों आदि के लिए अनेक तरह की तकनीकी और निजी सेवाएं शुरू हो जाने से इनका चलन कम हो गया है। इसी तरह इंटरनेट बैंकिंग और धन हस्तांतरण की त्वरित सुविधाएं आने से मनीआर्डर सेवा का भी कम ही लोग इस्तेमाल करते हैं। जब तार सेवाओं का चलन घट गया था, तो उसे बंद करके उसके कर्मचारियों को डाक सेवा से जोड़ दिया गया। उसी तरह डाक विभाग की जो सेवाएं पुरानी पड़ गई हैं, उनके स्थान पर नई सेवा शुरू करने से कर्मचारियों का सदुपयोग भी हो सकेगा। इसके अलावा जब इस सेवा में विस्तार होगा, तो बहुत सारे नए लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी खुलेंगे। कहा जा सकता है कि जब ग्रामीण बैंक और सहकारी बैंकों के जरिए हर गांव तक बैंकिंग सेवाएं पहुंचाने की व्यवस्था पहले से है तो इसमें एक नई व्यवस्था शुरू करने और उस पर अतिरिक्त धन खर्च करने की क्या तुक थी! पर डाकघरों की पहुंच, उनकी विश्वसनीयता और कार्यप्रणाली बैंकों की तुलना में बिल्कुल भिन्न है। डाकघर लोगों तक खुद पहुंचता है, जबकि बैंकों तक लोगों को जाना पड़ता है।

डाकघरों की पहुंच देश के लगभग हर व्यक्ति तक है, चाहे वह पहाड़ की चोटी पर बसा अकेला घर ही क्यों न हो। जबकि बैंकों की सेवाएं हासिल करने के लिए लोगों को घर से दूर चल कर जाना होता है। फिर बैंकों में खाते खुलवाने और उनकी कार्यप्रणाली डाक सेवाओं की तुलना में अधिक तकनीकी है। डाकघर उसकी अपेक्षा आम लोगों की सुविधाओं के बहुत करीब है। डाकघर भी अब संचार तकनीक की आधुनिक सेवाओं से जुड़ चुके हैं, ऐसे में पैसे के लेन-देन में उन्हें मुश्किल नहीं आएगी। खासकर गरीब और अपढ़ लोग बैंक कर्मियों से संवाद करने की अपेक्षा डाकिये से संवाद करने में ज्यादा सहज महसूस करते हैं, इसलिए वे अपने डाक बैंक खाते के जरिए सरकारी योजनाओं का लाभ भी उठाने में सहज महसूस करेंगे।

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