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शिकायत के मंच

अगर कोई सरकारी महकमा जन-उपयोगिता के मद्देनजर फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर अपना पृष्ठ बनाता है और कोई भुक्तभोगी वहां शिकायत दर्ज करता है तो यह निपटारे का विषय होना चाहिए। मगर हैरानी की बात है कि बंगलुरु में जब एक दंपति ने एक पुलिस अधिकारी के दुर्व्यवहार की शिकायत यातायात पुलिस के फेसबुक पृष्ठ […]

अगर कोई सरकारी महकमा जन-उपयोगिता के मद्देनजर फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर अपना पृष्ठ बनाता है और कोई भुक्तभोगी वहां शिकायत दर्ज करता है तो यह निपटारे का विषय होना चाहिए। मगर हैरानी की बात है कि बंगलुरु में जब एक दंपति ने एक पुलिस अधिकारी के दुर्व्यवहार की शिकायत यातायात पुलिस के फेसबुक पृष्ठ पर कर दी तो उस पर गौर करने के बजाय पुलिस ने उसके खिलाफ डराने-धमकाने और सरकारी काम में बाधा डालने का आरोप लगाते हुए प्राथमिकी दर्ज कर दी। अब इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने उस दंपति को पुलिस के लगाए आरोपों से मुक्त कर दिया है। मगर इससे यह सवाल एक बार फिर उठा है कि सोशल मीडिया के मंचों पर अपनी बात कहने की क्या सीमा है और अगर कोई व्यक्ति शिकायत के पेज पर अपनी बात कहता है तो उसे किन परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। यह घटना करीब डेढ़ साल पहले की है। इस मामले में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने दंपति को कोई राहत देने से इनकार कर दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाइकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए कहा है कि यातायात पुलिस ने फेसबुक पर जनता के लिए ही पृष्ठ बनाया था। यों भी, विभिन्न कानून प्रवर्तन एजेंसियों की ओर से सोशल वेबसाइटों पर बनाए गए पृष्ठों का मकसद आखिर आम जनता की मदद करना है। मगर सवाल है कि बंगलुरु के इस मामले में जिस तरह एक दंपति को कानूनी लड़ाई में उलझना पड़ा, उसका सरकारी महकमों के शिकायती फेसबुक पृष्ठ पर अपनी बात कहने के लिए उत्सुक व्यक्ति पर कैसा असर पड़ेगा!

संचार और संप्रेषण के सशक्त संसाधन के रूप में इंटरनेट और सोशल मीडिया के मंचों तक लोगों की पहुंच के साथ-साथ इनकी सामाजिक उपयोगिता भी लगातार बढ़ती जा रही है। बल्कि फेसबुक जैसे मंचों ने तो आज प्रशासनिक व्यवस्था में एक अहम भूमिका निभानी शुरू कर दी है। यातायात पुलिस जैसे कुछ महकमों ने आम जनता की शिकायतें दर्ज करने के लिए बाकायदा अपना फेसबुक पृष्ठ बनाया है। लेकिन बंगलुरु की घटना से साफ है कि जब इस तरह के मंच पर दर्ज शिकायतें संबंधित महकमे के किसी अधिकारी के लिए असुविधाजनक साबित होने लगती हैं तो वे शिकायतकर्ता को परेशान करने की कोशिश भी करते हैं। यह अपनी राय जाहिर करने के लिए सोशल मीडिया के मंचों का उपयोग करने वाले लोगों के लिए दोहरी समस्या है। सही है कि सोशल मीडिया के लगातार फैलते दायरे के साथ उस पर कुछ टिप्पणी करने के मामले में अपेक्षित परिपक्वता दिखाई नहीं देती। पिछले कुछ सालों में देखा गया है कि ट्विटर और फेसबुक जैसी जगहों का इस्तेमाल कुछ समूहों ने नफरत फैलाने के लिए भी किया। ऐसे लोग शायद ही कभी पकड़ में आएं, मगर सोशल मीडिया पर कोई टिप्पणी करने या फिर तस्वीर साझा करने वाले जिन लोगों की गिरफ्तारियां सुर्खियों में आर्इं, वे बहुत सामान्य मामले थे और उन्हें अभिव्यक्ति के अधिकार का हनन कहा जा सकता है। यह सूचना तकनीक कानून की धारा 66-ए का दुरुपयोग है, जिसे हथियार बना कर प्रशासन कई बार नागरिकों की अभिव्यक्ति को बाधित करने की कोशिश करता है। लेकिन सरकारी महकमों के शिकायत संबंधी पृष्ठों पर दर्ज मामलों का स्वरूप सामान्य टिप्पणियों से अलग होता है और उनकी जांच कर हल निकाला जाना चाहिए। यह जन-उपयोगिता के लिहाज से सोशल मीडिया के मंचों का सकारात्मक इस्तेमाल होगा और सरकार को इसे बढ़ावा देना चाहिए।

 

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