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संपादकीयः हिंसा का रास्ता

ताजा हिंसा से एक दिन पहले भी जाफराबाद में सीएए के विरोधियों और समर्थकों के बीच टकराव हुआ था, लेकिन कुछ देर की पत्थरबाजी के बाद पुलिस ने स्थिति पर काबू पा लिया था। सवाल है कि हिंसा में लिप्त होने वाले दोनों ही समूहों के लोग क्या यह नहीं समझ पा रहे कि अगर समय रहते इस टकराव को खत्म नहीं किया गया तो यह किस खतरनाक रास्ते की ओर बढ़ सकता है?

Author Published on: February 25, 2020 12:51 AM
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देश की राजधानी दिल्ली में जिस तरह की तनावपूर्ण स्थितियां बन गई हैं, वे बेहद चिंताजनक हैं। पिछले करीब दो महीने से नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शनों के दौरान कुछ असामाजिक तत्त्वों की ओर से हिंसा फैलाने की कोशिश के अलावा अब तक हालात ज्यादा जटिल नहीं हुए थे। लेकिन सोमवार को दिल्ली के कई इलाकों में हुई हिंसा से यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या इस रास्ते किसी भी समस्या का समाधान संभव है! गौरतलब है कि जाफराबाद, मौजपुर, सीलमपुर सहित कुछ अन्य इलाकों में सीएए के विरोध में चल रहे प्रदर्शनों के बरक्स कुछ लोग इसके समर्थन में सड़क पर उतर आए। किसी मुद्दे पर समर्थन या विरोध को सुलझाने का रास्ता अगर बातचीत हो, तब किसी समाधान तक पहुंचा जा सकता है। लेकिन दोनों पक्ष न केवल आमने-सामने आ गए, बल्कि उनके बीच टकराव शुरू हो गया। दोनों तरफ से हुई पत्थरबाजी और आगजनी ने दंगे जैसे हालात पैदा कर दिए। इस पर काबू पाने के लिए पुलिस को कार्रवाई करनी पड़ी और कुछ जगहों पर धारा 144 भी लगाने की नौबत आई। लेकिन इस बीच दोनों पक्षों के उपद्रवियों की हिंसा पर काबू पाने के दौरान एक हेड कांस्टेबल की मौत हो गई और एक अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारी घायल हो गए।

हालांकि ताजा हिंसा से एक दिन पहले भी जाफराबाद में सीएए के विरोधियों और समर्थकों के बीच टकराव हुआ था, लेकिन कुछ देर की पत्थरबाजी के बाद पुलिस ने स्थिति पर काबू पा लिया था। सवाल है कि हिंसा में लिप्त होने वाले दोनों ही समूहों के लोग क्या यह नहीं समझ पा रहे कि अगर समय रहते इस टकराव को खत्म नहीं किया गया तो यह किस खतरनाक रास्ते की ओर बढ़ सकता है? अब तक आई खबरों पर गौर करें तो यह समझना मुश्किल है कि विरोध में खड़े लोगों को पहले से चल रहे प्रदर्शन वाली जगह के बजाय ऐसी जगह को चुनना क्यों जरूरी लगा जिससे आम जनजीवन बड़े स्तर पर प्रभावित होता! दूसरी ओर, जो लोग सीएए का समर्थन कर रहे हैं, उन्हें अपने प्रदर्शन के लिए उसी जगह के आसपास जाने की जरूरत क्यों महसूस हुई। खासतौर पर तब जब इस बात की आशंका पहले से थी कि अगर दोनों पक्ष आमने-सामने हुए तो टकराव हिंसा में बदल जा सकता है। अगर किसी एक पक्ष ने हिंसा भड़काने वाली कोई गतिविधि की भी, तो क्या दूसरे पक्ष ने बराबर के स्तर पर जवाब देकर हालात को जटिल नहीं बना दिया? इस तरह की हिंसा के सहारे कहां पहुंचा जा सकता है?

यह ध्यान रखने की जरूरत है कि विरोध और समर्थन में खड़े लोग अगर टकराव और हिंसा का रास्ता नहीं छोड़ते हैं तो इसका हासिल कुछ भी अच्छा नहीं हो सकता! पुलिस और बाकी राजनीतिक दलों को सबसे पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जिस तरह कुछ नेताओं ने चेतावनी के लहजे में लोगों के बीच हिंसा और आक्रोश को भड़काने वाली भाषा का इस्तेमाल किया, उन पर रोक लगाई जाए और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशन में सीएए के विरोध में प्रदर्शन पर बैठे लोगों से बातचीत के जरिए कोई रास्ता निकालने की कोशिश चल रही है। लेकिन इस मसले पर लोगों के बीच अगर किसी तरह की आशंका खड़ी हो रही है तो उस पर बातचीत के जरिए समाधान की राह तलाशना अगर केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है, तो इसमें दिल्ली सरकार को भी सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। दिल्ली सरकार केवल यह कह कर पल्ला नहीं झाड़ सकती कि कानून-व्यवस्था बहाल करना पुलिस का काम है।

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