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संपादकीय: हिंसा का रास्ता

एनएससीएन वृहत्तर नगालैंड या नगालिम की मांग करता रहा है। यह संगठन सन अस्सी में शिलांग समझौते के विरोध में बना था। पर बाद में भारत सरकार के साथ शांति वार्ता को लेकर इसका विभाजन हो गया था- इसाक-मुइवा गुट और खापलांग गुट में।

Author May 23, 2019 1:34 AM
यह संगठन सन अस्सी में शिलांग समझौते के विरोध में बना था।

अरुणाचल प्रदेश के तिरप में निवर्तमान विधायक के परिजनों और सुरक्षाकर्मियों समेत ग्यारह लोगों की हत्या वहां सुरक्षा-व्यवस्था संबंधी नई चुनौतियों को रेखांकित करती है। इस हत्या में नगा अलगाववादी संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल आॅफ नगालैंड यानी एनएससीएन का हाथ माना जा रहा है। इस हमले में मारे गए विधायक तिरोंग अबो के मौजूदा चुनाव में भी विजयी होने की संभावना जताई जा रही थी। अबो नेशनल पीपुल्स पार्टी यानी एनपीपी के नेता थे। इसलिए इस हत्याकांड में राजनीतिक वैमनस्य का कोण भी देखा जा रहा है। हालांकि इससे पहले भी दो बार एनएससीएन के लोग अबो पर हमला कर चुके थे, इसलिए उन्हें विशेष सुरक्षा दी गई थी। बीते मार्च में अबो के दो समर्थकों की भी हत्या कर दी गई थी। इसलिए इस घटना में एनएससीएन का हाथ होने पर संदेह अधिक जा रहा है। इससे पहले भी एनएससीएन का एनपीपी और भाजपा नेताओं की हत्या में हाथ रहा है। इस तरह भारत सरकार के साथ समझौते के बाद जिस वृहत्तर नगालैंड की मांग के शांत पड़ जाने का भरोसा किया जा रहा था, वह सही नहीं माना जा सकता।

एनएससीएन वृहत्तर नगालैंड या नगालिम की मांग करता रहा है। यह संगठन सन अस्सी में शिलांग समझौते के विरोध में बना था। पर बाद में भारत सरकार के साथ शांति वार्ता को लेकर इसका विभाजन हो गया था- इसाक-मुइवा गुट और खापलांग गुट में। इसाक-मुइवा गुट ने भारत सरकार की तरफ से ज्यादातर मांगें मान लिए जाने के बाद अपनी चरमपंथी गतिविधियों पर विराम लगाने पर सहमति जता दी थी। उसने अपने प्रशिक्षण शिविर बंद भी कर दिए थे, पर खापलांग गुट निरंतर सक्रिय रहा। एनएससीएन की गतिविधियां नगालैंड में तो हैं ही, अरुणाचल में भी उसका सशक्त प्रभाव दिखाई देता है। इस संगठन की एक तरह से समांतर सरकार चलती है। एनएससीएन के नेता विदेशों में रह कर अलगाववादी गतिविधियों का संचालन करते हैं। उनके पास अत्याधुनिक हथियार और संचार सुविधाएं हैं। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अबो के काफिले की हमलावरों को पुख्ता जानकारी थी और उन्होंने अबो के सुरक्षाकर्मियों की परवाह किए बगैर एक तरह से घेर कर हमला किया और काफिले में शामिल सभी लोगों को मौत के घाट उतार दिया। वहां का सरकारी सुरक्षा तंत्र उनके सामने इस कदर कमजोर है कि उसे उनकी साजिशों की भनक तक नहीं मिल पाती।

नगालैंड में अक्सर जातीय हिंसा भड़क उठती है। इसकी वजह यह है कि वहां की कुछ जातियों को लगता रहा है कि सरकार ने जान-बूझ कर उन्हें उपेक्षित कर रखा है। इसलिए वहां वृहत्तर नगालैंड की मांग उठती रही है, जिसमें अरुणाचल प्रदेश के भी कुछ नगाबहुल इलाकों को शाामिल करने की मांग प्रमुखता से उठाई जाती है। मगर सरकार इसे मानने को तैयार नहीं होती, इसलिए कि अरुणाचल के लोग इस शर्त को मानने को तैयार नहीं। ऐसे में एनएससीएन वहां के स्थानीय लोगों को सरकार के खिलाफ लामबंद करता रहा है। पूरे सरकारी तंत्र के खिलाफ इसी वजह से वहां के लोगों में आक्रोश रहता आया है। लंबे समय से केंद्र सरकार उनके असंतोष को कम करने का प्रयास करती भी नहीं देखी गई। वहां रोजगार के नए अवसर, शिक्षा, चिकित्सा आदि की सुविधाएं उपलब्ध कराने के कारगर प्रयास हुए होते, तो यह असंतोष शायद काफी कम हो गया होता। लिहाजा, दोनों सरकारों को इस समस्या पर काबू पाने की दिशा में सोचने की जरूरत है।

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