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संपादकीयः उम्मीदों का दौरा

इसमें कोई शक नहीं कि ट्रंप की भारत यात्रा का कारोबारी महत्त्व ज्यादा है। आयात शुल्क के मुद्दे पर दोनों देशों के बीच जिस तरह के मामले उठते रहे हैं, उससे कई बार ऐसा लगा था कि दोनों देशों के बीच कारोबारी मुद्दों को लेकर मामला बिगड़ रहा है। ट्रंप ने भारत को ‘शुल्कों का बादशाह’ तक कह डाला था।

Author Updated: February 25, 2020 2:54 AM
ट्रंप की भारत यात्रा का कारोबारी महत्त्व ज्यादा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा दोनों देशों के बीच अब गठजोड़ और कारोबारी रिश्तों से कहीं आगे निकल चुकी है। अमदाबाद पहुंचने पर अमेरिकी राष्ट्रपति का जिस गर्मजोशी के साथ भव्य स्वागत हुआ, उससे भारत और अमेरिका के बीच रिश्तों का नया अध्याय शुरू हो चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ट्रंप के बीच यह आठवीं मुलाकात है। जाहिर है, दोनों के बीच रिश्ते दूसरे राष्ट्राध्यक्षों की तुलना में ज्यादा नजदीकी बन चुके हैं और इसीलिए दोनों के बीच जिस तरह का तालमेल बन गया है, वह भारत-अमेरिका के रिश्तों को नया आयाम देने में बड़ी भूमिका निभा रहा है। ऐसे में सोमवार को अमदाबाद में अमेरिकी राष्ट्रपति के स्वागत समारोह ‘नमस्ते ट्रंप’ का सफल आयोजन भारत के लिए सिर्फ कूटनीतिक ही नहीं, बल्कि हर तरह से बड़ी उपलब्धि कहा जाएगा। यों भारत और अमेरिका के बीच रिश्ते काफी पुराने रहे हैं, लेकिन एक समय था जब भारत को रूस का बड़ा समर्थक और करीबी माना जाता था। लेकिन उस दौर में भी अमेरिकी राष्ट्रपति भारत के दौरे पर आते रहे और रिश्तों का सिलसिला बढ़ता गया। आज भारत और अमेरिका दोनों के समक्ष नई सदी की चुनौतियां हैं। अमेरिका चीन और रूस के बढ़ते प्रभुत्व को बड़ी चुनौती के रूप में देख रहा है, वहीं भारत के लिए अमेरिका एक ऐसा बड़ा साझेदार देश है जो न सिर्फ कारोबारी क्षेत्र में, बल्कि सामरिक और रक्षा क्षेत्र में भी भारत के साथ खड़ा हुआ दिख रहा है।

इसमें कोई शक नहीं कि ट्रंप की भारत यात्रा का कारोबारी महत्त्व ज्यादा है। आयात शुल्क के मुद्दे पर दोनों देशों के बीच जिस तरह के मामले उठते रहे हैं, उससे कई बार ऐसा लगा था कि दोनों देशों के बीच कारोबारी मुद्दों को लेकर मामला बिगड़ रहा है। ट्रंप ने भारत को ‘शुल्कों का बादशाह’ तक कह डाला था। इस पर भारत ने जो सख्त रुख दिखाया था, उसका संदेश साफ था कि वह अपने व्यापारिक हितों की अनदेखी कतई नहीं करेगा। ट्रंप के सामने अभी मुश्किल यह है कि इसी साल अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव हैं और वे दोबारा लड़ने की तैयारी में है। ऐसे में वे भारत के साथ कोई भी समझौता बहुत ही नाप-तौल कर करेंगे। दोनों देशों के बीच संवेदनशील कृषि, डेयरी, डाटा संरक्षण और स्थानीयकरण, ई-कॉमर्स जैसे कई मुद्दे हैं जिन पर कोई एक राय नहीं बन पाई है। भारत पहले ही साफ कह चुका है कि दूसरे देशों के लिए अपना बाजार खोलने के लिए वह किसी के दबाव में नहीं आने वाला, जैसा स्पष्ट और कड़ा रुख क्षेत्रीय व्यापकआर्थिक भागीदारी (आरसीइपी) पर अख्तियार किया है, उससे पीछे हटने का सवाल नहीं है। ऐसे में भारत और अमेरिका के बीच सिर्फ वही कारोबारी समझौते परवान चढ़ेंगे जिनसे दोनों के हित पूरे हों।

ट्रंप ने आतंकवाद के मुद्दे को लेकर भी चिंता जताई है। भारत और अमेरिका दोनों ही इस्लामी आतंकवाद से जूझ रहे हैं। अमेरिका ने दुनिया का सबसे बड़ा आतंकी हमला झेला है। भारत पिछले तीन दशक से सीमापार आतंकवाद से जूझ रहा है। अमेरिका अच्छी तरह जानता है पाकिस्तान ने भारत पर कितनी बार आतंकी हमले किए हैं और कश्मीर में उग्रवाद फैलाया है। ऐसे में आतंकवाद से लड़ने में ट्रंप अब भारत की क्या और कितनी मदद कर सकते हैं, पाकिस्तान को कितना रास्ते पर ला सकते हैं, यह देखने की बात है। रक्षा और सुरक्षा संबंधी करार और सहायता अपनी जगह हैं, लेकिन अमेरिका भारत के साथ कितनी मजबूती के साथ खड़ा रहता है, यह बड़ी बात है।

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