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संपादकीय: इलाज में पारदर्शिता

हालांकि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों में यह साफतौर पर दर्ज है कि डॉक्टरों को अपनी पर्ची पर स्पष्ट और बड़े अक्षरों में सलाह, दवा और जांच के नाम लिखने होंगे। विभिन्न निजी अस्पतालों को भी मान्यता देते समय यह शर्त लिखित रूप में सामने रखी जाती है।

इससे मरीजों और उनके परिजनों को सुविधा होगी।

हमारे देश में बीमारी और चिकित्सा को लेकर आम लोगों के बीच जागरूकता का स्तर पहले ही बहुत कम है। ज्यादातर लोग अपनी सेहत खराब होने पर बीमारी से लेकर उसके कारणों के बारे में कई तरह का अंदाजा लगाने में ही अपना काफी वक्त गुजार देते हैं। फिर डॉक्टर के पास जाने के बाद बीमारी की पहचान, उसके लिए परामर्श के तौर पर ली जाने वाली दवाओं के नाम और जांच आदि के जो ब्योरे पर्चे पर लिखे जाते हैं, उन्हें समझना मरीज या उनके परिजनों के लिए मुमकिन नहीं होता है। उसे या तो खुद डॉक्टर समझ पाता है या फिर उसका सहयोगी। कई बार तो दवा की दुकान में बैठे लोग भी कुछ शब्दों या अक्षरों को लेकर भ्रमित हो जाते हैं। इसकी मुख्य वजह यह है कि पर्ची पर डॉक्टर की लिखावट स्पष्ट नहीं होती। एक तरह से वह संकेत की भाषा में लिखा होता है, जिसे समझना आमतौर पर सबके वश में नहीं होता। इसकी वजह से कई तरह की परेशानी खड़ी होती है, जिसमें दवाइयां बदल जाने से लेकर उसके असर तक में जोखिम पैदा होता है।

इसलिए समय-समय पर ऐसी मांग उठती रही है कि डॉक्टर मरीजों के लिए बनाई जाने वाली पर्ची पर परामर्श के तौर पर निर्देशों और खासकर दवाइयों के नाम और जांच के बारे में स्पष्ट और बड़े अक्षरों में लिखें, ताकि वह न केवल कंपाउंडरों और दवा दुकानदारों, बल्कि खुद मरीजों या उनके परिजनों को भी आसानी से समझ में आए। इससे एक तरह की पारदर्शिता भी सुनिश्चित होगी। शायद यही वजह है कि लखनऊ की किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी ने अपने यहां काम करने वाले सभी डॉक्टरों के लिए यह निर्देश जारी किया है कि वे अब पर्चे पर दवाओं और जांच के नाम बड़े-बड़े और साफ अक्षरों में लिखें। यों भी, अगर अपना लिखा केवल डॉक्टर और उसके कंपाउंडर को समझ में आता है तो दूसरों की मदद से मरीजों की तात्कालिक मदद तो हो जाती है, लेकिन अगर किन्हीं वजहों से बाद में बीमारी और उसके इलाज के चिकित्सकीय अध्ययन की जरूरत पड़े तो उसमें अस्पष्टता और उसके नतीजे में गलत निष्कर्ष का खतरा बना रहता है।

हालांकि मेडिकल काउंसिल आॅफ इंडिया के नियमों में यह साफतौर पर दर्ज है कि डॉक्टरों को अपनी पर्ची पर स्पष्ट और बड़े अक्षरों में सलाह, दवा और जांच के नाम लिखने होंगे। विभिन्न निजी अस्पतालों को भी मान्यता देते समय यह शर्त लिखित रूप में सामने रखी जाती है। खुद सरकार की ओर से समय-समय पर इस संबंध में स्पष्ट निर्देश जारी किए जाते हैं। मगर डॉक्टरों को इन नियमों का पालन जरूरी नहीं लगता है। इसके समांतर कई बार यह भी देखा जा सकता है कि डॉक्टर या उसके सहयोगी मरीजों के लिए दवा लिखने के बाद किसी खास दुकान से ही दवा खरीदने की सलाह देते हैं। दिलचस्प है कि उस दुकानदार को पर्चे पर लिखी गई दवा का नाम आसानी से समझ में आ जाता है। यानी यह भी संभव है कि इस क्रम में कमीशन के लेन-देन का खेल चलता हो। इसलिए अगर पर्चे पर दवा और जांच का नाम साफ-साफ लिखा जाए तो उससे मरीजों या उनके परिजनों को बीमारी और उसके इलाज के लिए खरीदी जाने वाली दवा को लेकर स्पष्टता होगी। इससे न सिर्फ मरीजों और उनके परिजनों को सुविधा होगी, बल्कि चिकित्सा सेवा पर भरोसा भी बढ़ेगा।

 

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