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संपादकीय: लाइलाज बीमारी

राजनीति के अपराधीकरण का मुद्दा हाल में तब उठा जब चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

Author नई दिल्ली | Published on: January 27, 2020 12:51 AM
राजनीति के अपराधीकरण को लेकर चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट और प्रबुद्ध तबके की ओर से समय-समय पर चिंता जताई जाती रही है।

राजनीति का अपराधीकरण भारतीय लोकतंत्र की लाइलाज बीमारी बन चुकी है। ज्यादा पीड़ादायक तो यह है कि इसमें हमारे राजनीतिक दलों की ही प्रमुख भूमिका रही है और वे चाहते भी नहीं हैं कि राजनीति में साफ-सफाई का अभियान चले और आपराधिक छवि वाले लोगों के सदन में पहुंचने पर रोक लगे। राजनीति के अपराधीकरण को लेकर चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट और प्रबुद्ध तबके की ओर से समय-समय पर चिंता जताई जाती रही है। सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ ने तो इस गंभीर मसले पर याचिकाओं की सुनवाई के बाद पिछले साल स्पष्ट रूप से यह कहा था कि इसके लिए संसद को कानून बनाना चाहिए। लेकिन संसद की ओर से इस दिशा में अब तक कोई पहल नहीं होना इस बात का प्रमाण है कि हमारे नेतागण ही नहीं चाहते कि राजनीति दागियों से मुक्त हो। इसीलिए सर्वोच्च अदालत ने इस मसले पर एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है और चुनाव आयोग से हफ्ते भर के भीतर रूपरेखा पेश करने को है जिसमें यह बताया जाए कि दागियों की समस्या से कैसे निपटा जा सकता है।

राजनीति के अपराधीकरण का मुद्दा हाल में तब उठा जब चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। आयोग का कहना था कि उम्मीदवारों का आपराधिक ब्योरा प्रकाशित कराने के सर्वोच्च अदालत के आदेश पर अमल के बावजूद राजनीति का अपराधीकरण रुक नहीं पा रहा है, इसलिए अब राजनीतिक दलों को निर्देश दिया जाए कि वे आपराधिक छवि वाले लोगों को टिकट ही न दें। दुखद तो यह है कि सर्वोच्च अदालत के कड़े रुख, चुनाव आयोग के निर्देशों के बावजूद हमारे राजनीतिक दल अपनी ओर से इस दिशा में कोई पहल नहीं कर रहे हैं। यह एक तरह से न्यायपालिका और चुनाव आयोग को ठेंगा दिखाना है। राजनीतिक दल शुरू से ही यह दलील देते आए हैं कि जब तक कोई अपराधी दोषमुक्त करार नहीं दे दिया जाता, उसे दोषी नहीं माना जा सकता। दागदार नेता इसी का फायदा उठा रहे हैं, क्योंकि लंबी और जटिल कानूनी प्रक्रिया में मुकदमों के निपटान में बरसों गुजर जाते हैं और आरोपी के लिए दोषी साबित नहीं होने तक चुनाव लड़ने और जीतने पर सदन में पहुंचने का रास्ता खुला रहता है।

ऐसे में सवाल घूम फिर कर वहीं आ जाता है कि किया क्या जाए, जिससे दागदार लोगों का न केवल सदनों में, बल्कि राजनीति में ही प्रवेश बंद हो जाए। इस हकीकत से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि ये काम तो राजनीतिक दलों और संसद को ही करना है। सर्वोच्च अदालत के पास कानून बनाने का अधिकार नहीं है, वह सिर्फ निर्देश और सुझाव दे सकती है। पर राजनीतिक दल और संसद इस बारे में मौन हैं। इससे समाज में यह स्पष्ट संदेश जाता है कि भले विचारधाराओं के स्तर पर या अन्य राष्ट्रीय मुद्दों पर हमारे राजनीतिक दलों में कितने ही मतभेद क्यों न हों, लेकिन दागियों के मुद्दे पर सारे दलों में सांठगांठ है। इसी का नतीजा है कि चुनावी राजनीति में हत्या, हत्या की कोशिश और बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों तक में शामिल नेताओं का असर कायम है। यह भारतीय राजनीति की त्रासदी है कि जिसमें शायद ही कोई ऐसा दल हो जिसमें आपराधिक रिकार्ड वाले नेता न हों। अगर ऐसा कठोर कानून बन जाए जो आपराधिक मामले दर्ज होने वालों के लिए चुनाव लड़ने के रास्ते बंद कर सके, तो हमारी संसद और विधानसभाएं दागदार चेहरों से मुक्ति पा सकती हैं।

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