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संपादकीय: हिंसा की आंच

खबरों के मुताबिक रविवार को पत्थलगड़ी समर्थकों ने गांव में ग्रामीणों के साथ बैठक की थी।

Author नई दिल्ली | Updated: January 24, 2020 12:52 AM
पुलिस का कहना है कि इस घटना में पत्थलगड़ी के बहाने आपसी दुश्मनी निकाली गई है।

झारखंड में पश्चिमी सिंहभूम जिले के एक माओवाद प्रभावित इलाके में जैसी घटना सामने आई है, वह राज्य में हाल ही में सत्ता में आई हेमंत सोरेन सरकार के लिए एक पहली, लेकिन बड़ी चुनौती है। राज्य के गुदड़ी प्रखंड के बुरुगुलीकेरा गांव में पहले नौ लोगों का अपहरण कर लिया गया और बाद में सात लोगों की हत्या कर दी गई। फिलहाल सामने आई खबरों के मुताबिक इस हत्याकांड को अंजाम देने का आरोप राज्य में सुर्खियों में रहे पत्थलगड़ी आंदोलन के समर्थकों पर है, जिन्होंने इस मसले का विरोध जताने पर कुछ लोगों को यह ‘सजा’ दी। सवाल है कि देश में कानून के शासन के तहत चलने वाले किसी भी इलाके में किसी व्यक्ति या समूह को यह अधिकार कैसे मिल जाता है कि वह पारंपरिक या विशेष नियम-कायदों के तहत ऐसी जघन्य घटना को अंजाम दे! हालांकि पुलिस का कहना है कि इस घटना में पत्थलगड़ी के बहाने आपसी दुश्मनी निकाली गई है; पत्थलगड़ी के समर्थकों और विरोधियों के बीच कुछ दस्तावेज जमा करने और सरकारी योजनाओं को खारिज करने को लेकर पिछले कई दिनों से विवाद चल रहा था।

अगर पुलिस की ही बात सही मानें, तो क्या इस मामले में खुद पुलिस महकमा और प्रशासन कठघरे में खड़ा नहीं होता कि बीते कई दिनों से चल रहा विवाद अपने अंजाम में इतना त्रासद नतीजे लेकर आया और समूचा तंत्र बेखबर रहा? राज्य का खुफिया विभाग क्या कर रहा था? खबरों के मुताबिक रविवार को पत्थलगड़ी समर्थकों ने गांव में ग्रामीणों के साथ बैठक की थी। इसी बीच वहां मौजूद दो गुटों में विवाद हो गया, जो बाद में जानलेवा झड़प में बदल गया था। इसके बाद नौ लोगों का अपहरण कर लिया गया और बाद में सात लोगों की हत्या कर दी गई। जाहिर है, यह सरेआम हुई घटना है, जिसके बारे में राज्य की पुलिस और खासतौर पर खुफिया तंत्र को जानकारी होनी चाहिए थी। अगर समय रहते जरूरी कदम उठाए गए होते तो शायद इस हत्याकांड को रोका जा सकता था। अपराध को अंजाम देने वाले हर जगह अपने लिए माकूल मौके का इंतजार करते हैं या इसका फायदा उठा कर किसी आपराधिक घटना को अंजाम देते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि एक आम रिवायत की तरह पुलिस और प्रशासन की नींद तभी खुलती है, जब कोई बड़ी वारदात सामने आती है। क्या कभी इस तरह की लापरवाही की जिम्मेदारी तय की जाती है?

गौरतलब है कि हेमंत सोरेन सरकार ने अपने मंत्रिमंडल की पहली बैठक में ही पत्थलगड़ी समर्थकों पर पिछली सरकार के कार्यकाल में देशद्रोह जैसी गंभीर धारा के तहत दर्ज मुकदमों को वापस लेने का फैसला किया था। यह नई सरकार की ओर से एक सकारात्मक पहलकदमी है। लेकिन अगर पत्थलगड़ी आंदोलन से जुड़े लोग या समूह राज्य और देश के कानून के दायरे का खयाल नहीं करेंगे, तो ऐसी पहल का क्या हासिल होगा? सही है कि पत्थलगड़ी आदिवासी समुदाय के बीच लंबे समय से चली आ रही एक परंपरा है और इसका एक खास महत्त्व है। स्थानीय लोगों के अधिकारों की सुरक्षा भी जरूरी है। लेकिन सवाल है कि क्या किसी खास परंपरा को ढाल बना कर देश के कानूनों से ऊपर उठ कर कोई गतिविधि संचालित की जा सकती है? मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा है कि कानून सबसे ऊपर है और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। उन्हें इसलिए भी यह हर हाल में सुनिश्चित करने की जरूरत है कि पिछली सरकार के कामकाज से निराश लोगों ने ही उन्हें सत्ता सौंपी है।

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