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संपादकीय: बदलाव के संकेत

श्रीलंका का एकमात्र पड़ोसी देश भारत है।

Author Published on: November 19, 2019 2:32 AM
जपक्षे परिवार का दबदबा अभी भी पहले की तरह ही कायम है। (फोटो-इंडियन एक्सप्रेस) जपक्षे परिवार का दबदबा अभी भी पहले की तरह ही कायम है। (फोटो-इंडियन एक्सप्रेस)

पड़ोसी देश श्रीलंका में हुए राष्ट्रपति चुनाव में श्रीलंका फ्रीडम पार्टी (एसएफपी) के उम्मीदवार गोटबाया राजपक्षे की जीत ने एक बार फिर से देश की राजनीति की दिशा बदल दी है। राजपक्षे ने यूनाइटेड नेशनल पार्टी (यूएनपी) के उम्मीदवार सजित प्रेमदासा को तेरह लाख वोटों से हराते हुए यह साबित कर दिया है कि उनकी पार्टी एसएफपी और राजपक्षे परिवार का दबदबा अभी भी पहले की तरह ही कायम है। श्रीलंका में 2005 से 2015 तक एसएफपी सत्ता में रही थी और तब गोटबाया के बड़े भाई महिंदा राजपक्षे देश के राष्ट्रपति रहे थे और उनके शासनकाल में गोटबाया दो साल रक्षा मंत्री भी रहे थे।

इस चुनाव में एसएफपी की जीत इसलिए भी महत्त्वपूर्ण मानी जा रही है कि श्रीलंका के सिंहल बहुल दक्षिणी हिस्से में राजपक्षे की पार्टी फिर से ताकतवर बन कर उभरी है। हालांकि देश के मुसलिम और तमिल बहुल इलाकों में श्रीलंका फ्रीडम पार्टी को खासी हार का सामना करना पड़ा। इससे यह भी साफ है कि देश में लंबे समय से तमिल समुदाय व अल्पसंख्यकों और सिंहलियों के बीच जो वैमनस्य चला आ रहा है, उसकी खाई अभी तक पटी नहीं है।

यह तो ठीक है कि महिंदा राजपक्षे के भाई के नाते श्रीलंका की राजनीति में गोटबाया का दबदबा बढ़ता गया, लेकिन इससे भी ज्यादा उन्हें जिस बात के लिए जाना जाता है वह है देश से मुक्ति चीतों का सफाया। राजपक्षे मूल रूप से फौजी अफसर रहे हैं और तमिल इलाकों से लिबरेशन टाइगर्स आॅफ तमिल ईलम (एलटीटीई) के सफाए के अभियान को उन्होंने अंजाम तक पहुंचाया। इसलिए वे श्रीलका में ‘टर्मिनेटर’ के नाम से भी विख्यात हैं। सिंहली बौद्ध समुदाय में वे महानायक के रूप में देखे जाते हैं तो तमिल समुदाय में उन्हें आज भी खलनायक के तौर पर ही देखा जाता है।

यही वजह है कि तमिल बहुल इलाकों में श्रीलंका फ्रीडम पार्टी जीत का मुंह नहीं देख पाई। सवाल है कि क्या नई सरकार का तमिलों के प्रति पहले जैसा द्वेषपूर्ण रवैया रहेगा या फिर वक्त के साथ उसमें कुछ उदारता देखने को मिलेगी। श्रीलंका में सिंहलियों और मुसलमानों के बीच होते रहने वाले संघर्ष भी देश के लिए कम बड़ी चुनौती नहीं हैं। श्रीलंका में पिछले साल चर्च पर जिस तरह से आत्मघाती हमले हुए और इसके पीछे इस्लामी आतंकवाद का हाथ माना गया, उससे भी नई सरकार को निपटना है। सिंहलियों को लगता है कि गोटबाया राजपक्षे ने जिस तरह से एलटीटीई का सफाया किया, उसी तरह वे इस्लामी आतंकवाद से भी निपट पाने में सक्षम होंगे।

श्रीलंका का एकमात्र पड़ोसी देश भारत है। इसलिए गोटबाया का सत्ता में आना भारत के लिए हर तरह से महत्त्वपूर्ण है और इसके दूरगामी अर्थ भी हैं। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि श्रीलंका में एक बार फिरसे चीन समर्थक सत्ता की वापसी हुई है। महिंदा राजपक्षे ने भी अपने दस साल के शासन में चीन के साथ गहरी दोस्ती निभाई थी और हंबनटोटा बंदरगाह का निर्माण कर हिंद महासागर में चीन की सैन्य गतिविधियों के लिए स्थायी रास्ता बना दिया था। अब भारत के दो पड़ोसी नेपाल और श्रीलंका में चीन समर्थक सरकारें हो गई हैं।

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का चीन के प्रति प्रेम जगजाहिर है। फिर, भारत श्रीलंका में रह रहे तमिलों के हितों की अनदेखी नहीं कर सकता। यही वजह है कि श्रीलंका की नीतियां सुरक्षा और सामरिक कारणों के अलावा भारत की अंदरूनी राजनीति को प्रभावित करती हैं। ऐसे में श्रीलंका की नई सरकार भारत के प्रति क्या रुख रखती है, यह आने वाला वक्त बताएगा।

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