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संपादकीय: जवानों की सुरक्षा

कश्मीर में इस वक्त सीआरपीएफ की पैंसठ बटालियनें हैं। इनके लिए अब बख्तरबंद गाड़ियां खरीदी जाएंगी और साथ ही तीस सीटों वाली बसें भी। ये बसें भी बुलेटप्रूफ होंगी। अभी इस बल के सामने समस्या यह है कि उसके पास बुलेटप्रूफ बसें नहीं हैं।

Author March 27, 2019 2:29 AM
पुलवामा हमला के बाद की तस्वीरें (फोटो सोर्स: फाइनेंसियल एक्सप्रेस )

कश्मीर घाटी में तैनात सीआरपीएफ यानी केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवानों की सुरक्षा के लिए सरकार ने बख्तरबंद गाड़ियां खरीदने का जो फैसला किया है, वह देर से किया गया एक जरूरी फैसला है। पिछले महीने पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हुए आतंकी हमले में चालीस से ज्यादा जवान शहीद हो गए थे। इसके बाद जांच में जो दो सबसे बड़ी खामियां निकल कर आई थीं, उनमें एक तो थी खुफिया तंत्र की नाकामी और दूसरी, इन जवानों के काफिले को बिना किसी सुरक्षा के एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने की कवायद। तब इस बात को लेकर सवाल उठे थे कि कैसे इतने सारे जवानों को एक साथ रवाना कर दिया गया और जिन वाहनों में ये जवान सवार थे, वे सुरक्षा उपायों से लैस क्यों नहीं थे। अगर बख्तरबंद गाड़ियां होतीं तो यह बल इतने जवान नहीं खोता। इसीलिए बाद में, लेकिन देर से यह फैसला हुआ कि जवानों को विमानों से एक जगह से दूसरी जगह भेजा जाना चाहिए।

सीआरपीएफ के जवानों को देश के विभिन्न इलाकों में बहुत ही जटिल हालात में काम करना पड़ता है। चाहे कश्मीर हो या उत्तर-पूर्व के राज्य या फिर छत्तीसगढ़ सहित कुछ राज्यों में नक्सलियों से लोहा लेने का मामला हो, सबसे पहले सीआरपीएफ ही मोर्चा संभालता है। इसलिए इस बल के जवानों की जान हमेशा खतरे में पड़ी रहती है। इसके अलावा, चुनावों के दौरान सुरक्षा व्यवस्था, दंगा नियंत्रण, अतिविशिष्ट लोगों और स्थलों की सुरक्षा जैसी जिम्मेदारियां भी इस बल के कंधों पर हैं। खासतौर से कश्मीर और छत्तीसगढ़ के नक्सली इलाकों में इन जवानों को जिस तरह के हमले झेलने पड़ते हैं उनमें आत्मरक्षा के लिए बख्तरबंद वाहनों की जरूरत काफी समय से बनी हुई है। कश्मीर में इस वक्त सीआरपीएफ की पैंसठ बटालियनें हैं। इनके लिए अब बख्तरबंद गाड़ियां खरीदी जाएंगी और साथ ही तीस सीटों वाली बसें भी। ये बसें भी बुलेटप्रूफ होंगी। अभी इस बल के सामने समस्या यह है कि उसके पास बुलेटप्रूफ बसें नहीं हैं। ऐसे में इन बसों को आत्मघाती हमलों या बारूदी सुरंगों के विस्फोट से बचाया नहीं जा सकता। कश्मीर में तैनात सीआरपीएफ बटालियनों के तोबम निरोधक दस्ते भी नहीं हैं। यह फैसला भी अब हुआ कि हर बटालियन के पास अपना एक बम निरोधक दस्ता होगा। ये उपाय ऐसे हैं जो आतंकवाद से ग्रस्त इलाकों में तैनात बलों को बुनियादी सुविधाओं के रूप में सबसे पहले मिलने चाहिए।

हालांकि सरकार और सुरक्षा बलों के प्रमुख इस बात से अनजान नहीं होंगे कि कश्मीर के हालात कैसे हैं और जवानों को किन गंभीर परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। इसलिए सवाल उठता है कि आखिर बुलेटप्रूफ वाहन खरीदने के फैसले में इतनी देरी क्यों की गई! इस देरी की कीमत देश को चालीस से ज्यादा जवानों की जान के रूप में चुकानी पड़ गई। क्या इसे सुरक्षा और रणनीति के स्तर पर बड़ी लापरवाही नहीं कहा जाना चाहिए? जवानों की सुरक्षा से जुड़े ऐसे फैसलों में देरी कहीं न कहीं सरकार में शीर्षस्तर पर बैठे लोगों की अदूरदर्शिता को उजागर करती है। घाटी में आतंकवाद से निपटने में सेना के बाद सीआरपीएफ ही दूसरा सबसे बड़ा अर्धसैनिक बल है जो रोजाना की हिंसा और पत्थरबाजों से निपट रहा है। सीआरपीएफ के जवानों के पास आज भी अत्याधुनिक हथियारों की भारी कमी है। यही वजह है कि ये जवान आतंकी हमलों के शिकार हो जाते हैं। सीआरपीएफ को जिन चुनौतीपूर्ण और मुश्किल हालात में काम करना पड़ रहा है उसमें जवानों की सुरक्षा एक चिंताजनक पहलू है और इसे किसी भी सूरत में नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

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