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संपादकीय: नरमी के निशान

पिछले साल ही आंकड़े आए कि विभिन्न शहरों में हजारों तैयार मकानों के खरीदादर नहीं मिल रहे।

नई दिल्ली | January 24, 2020 1:05 AM
भवन निर्माण के क्षेत्र में लाखों लोगों के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध होते हैं।

बढ़ती महंगाई और गिरती अर्थव्यवस्था की सूरत में मकानों की खरीद पर भी बुरा असर स्वाभाविक है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल मकानों की खरीद में नौ से दस फीसद तक गिरावट दर्ज हुई। हालांकि नोएडा, गुरुग्राम और कोलकाता में कुछ बढ़ोतरी दर्ज हुई, पर देश के तमाम महानगरों में स्थिति चिंताजनक ही दर्ज हुई। इसके लिए कुछ तो रियल एस्टेट यानी मकान-दुकान की खरीद-बिक्री, भवन निर्माण के क्षेत्र में उठाए गए सख्त कदम भी जिम्मेदार हैं। बेनामी संपत्ति की खरीद पर रोक लगाने के मकसद से सरकार ने मकानों-दुकानों की खरीद पर सख्ती बरतनी शुरू कर दी थी। इसके चलते भवन निर्माण के क्षेत्र में काफी सुस्ती आ गई थी। पिछले साल ही आंकड़े आए कि विभिन्न शहरों में हजारों तैयार मकानों के खरीदादर नहीं मिल रहे। जो लोग निवेश के मकसद से मकान खरीदते थे, उन्होंने अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं। इससे अर्थव्यवस्था पर पड़ती मार के मद्देनजर जब तैयार भवनों की बिक्री को सरकार ने प्रोत्साहन देना शुरू किया, तब भी कोई सकारात्मक नतीजा नजर नहीं आया। भवन निर्माण और इसकी खरीद-बिक्री में कमी आना कई दृष्टियों से चिंताजनक संकेत है।

भवन निर्माण के क्षेत्र में लाखों लोगों के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध होते हैं। दैनिक मजदूर से लेकर कुशल कारीगर और इंजीनियरिंग आदि के क्षेत्र से आए लोगों को बड़े पैमाने पर रोजगार उपलब्ध होता है। इसके अलावा भवन निर्माण सामग्री के कारोबार पर भी इसका असर पड़ता है। जाहिर है, इस क्षेत्र में सुस्ती आने से लाखों लोगों पर सीधा नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। ऐसा नहीं कि इस बीच लोगों को मकानों की जरूरत कम हुई है, बल्कि हकीकत यह है कि लोगों की क्रय शक्ति बहुत तेजी से घटी है। महंगाई बढ़ने और रोजगार के अवसर घटने से बहुत सारे लोगों के लिए अपने दैनिक खर्चे पूरा करना कठिन हो गया है, ऐसे में बड़े खर्चों की तरफ उन्होंने हाथ बढ़ाना छोड़ दिया। वाहन उद्योग पर पड़ी मार भी इसी का नतीजा है। यह स्थिति अचानक प्रकट नहीं हुई है।

कुछ सरकारी नीतियां इसके लिए जिम्मेदार हैं। छिपी बात नहीं है कि पहले नोटबंदी और फिर जीएसटी लागू होने के बाद बहुत सारे कारोबारियों की कमर टूट गई। इस तरह उनसे जुड़े बहुत सारे लोगों के सामने रोजगार का संकट पैदा हो गया। फिर जो लोग सुरक्षित नौकरी-पेशों में हैं, उन पर महंगाई की मार पड़ी और उन्होंने निवेश का जोखिम उठाना बंद कर दिया। भवन निर्माण के क्षेत्र में सख्ती चल ही रही थी, तो इन सारी स्थितियों के चलते मकानों की खरीद प्रभावित हुई।

भवनों की खरीद-बिक्री के कारोबार में तेजी और मंदी का सीधा असर बैंकों के कारोबार पर पड़ता है। भवन खरीद के क्षेत्र में दिया जाने वाला कर्ज सबसे सुरक्षित माना जाता है। फिर इसमें लंबी अवधि के कर्ज का लेन-देन होता है, जिससे लंबी अवधि तक बैंकों का कारोबार बना रहता है। तमाम रोजगार योजनाओं के तहत और बड़े उद्योगों को दिए कर्ज की वापसी न हो पाने के कारण भारतीय बैंकों की हालत पहले ही खस्ता हाल है, ऊपर से भवनों की बिक्री कम होने से उनकी कर्ज से होने वाली आय भी प्रभावित हुई है। रोजगार का एक बड़ा क्षेत्र अवरुद्ध हो जाने से लोगों की क्रय शक्ति बढ़ाने का इरादा भी कुंद हुआ है। ऐसे में अगले कुछ सालों तक अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने के प्रयास निरंतर चलेंगे, तभी कुछ बेहतरी के संकेत मिलने शुरू होंगे।

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