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संपादकीय: घटना और सबक

सवाल है कि आखिर उस हेलिकॉप्टर का संचार तंत्र पूरी तरह से काम क्यों नहीं कर रहा था। क्या अभियान पर भेजे जाने से पहले इस तरह की कोई पुख्ता जांच नहीं होती और चीजों को सामान्य मान कर चलने दिया जाता है?

balakot air strikeबीते दिनों भारतीय वायुसेना ने बालाकोट एयर स्ट्राइक का प्रमोशनल वीडियो जारी किया था।

इस साल बालाकोट में पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर हमले के अगले दिन यानी सत्ताईस फरवरी को भारतीय वायुसेना ने अपनी ही मिसाइल से अपना एमआइ-17 हेलिकॉप्टर मार गिराया था। यह घटना गफलत का परिणाम थी। हालांकि तब पाकिस्तान ने दावा किया था कि उसने भारत का एक हेलिकॉप्टर मार गिराया है, लेकिन बाद में वह झूठा साबित हुआ। वायुसेना प्रमुख आरकेएस भदौरिया ने इस घटना को बड़ी चूक मानते हुए स्वीकार किया है कि हमने अपना ही हेलिकॉप्टर मार गिराया था। हालांकि शुरुआती जांच में यह साफ हो गया था कि वायुसेना का हेलिकॉप्टर अपने ही सैनिकों ने भूलवश मार गिराया था, लेकिन अब विस्तृत जांच के बाद आधिकारिक रूप से वायुसेना प्रमुख ने इसे माना है। इस हादसे में एक पायलट सहित वायुसेना के छह जवान शहीद हो गए थे। घटना की जांच में जो चीजें निकल कर आई हैं, वे गंभीर और चौंकाने वाली हैं और सीधे-सीधे सैन्य अभियानों की तैयारियों से जुड़ी बड़ी खामियों की ओर इशारा करती हैं। हालांकि सेना की तैयारियों और उसकी गंभीरता को लेकर कोई संदेह नहीं, पर इनमें जो त्रुटियां रह जाती हैं, वे भारी पड़ती हैं। इसलिए आम आदमी के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि हमारी वायुसेना इतनी अत्याधुनिक है तो फिर कैसे ऐसी बड़ी चूक हो सकती है कि हम दुश्मन को नुकसान पहुंचाने के बजाय अपना ही नुकसान कर बैठें।

आखिर गलती कहां हुई, यह बड़ा प्रश्न है। अपने ही हेलिकॉप्टर के बारे में क्यों नहीं पता चल पाया? सवाल ज्यादा गंभीर इसलिए भी है कि मामला युद्ध में इस्तेमाल होने वाले हेलिकॉप्टर और विमानों से जुड़ा है और इसमें जोखिम के लिए कोई गुंजाइश नहीं होती। वायुसेना प्रमुख ने बताया है कि एमआइ-17 हेलिकॉप्टर की संचार प्रणाली दुरुस्त नहीं थी। ऐसे युद्धक हेलिकॉप्टरों में एक संचार तंत्र काम करता है जिससे यह पता चल सकता है कि हेलिकॉप्टर दुश्मन देश का है या अपना, लेकिन इस हेलिकॉप्टर में यह प्रणाली काम नहीं कर रही थी। इसका नतीजा यह हुआ कि जमीन पर नियंत्रण कक्ष को संकेत ही नहीं मिल पाए कि यह हेलिकॉप्टर अपना है। इसी भ्रम में इसे दुश्मन देश का समझ कर उस पर मिसाइल दाग दी गई। यह घटना सैन्य कार्यों में लगे सैनिकों और तकनीकी कर्मचारियों के बीच तालमेल की भारी कमी को भी उजागर करती है।

सवाल है कि आखिर उस हेलिकॉप्टर का संचार तंत्र पूरी तरह से काम क्यों नहीं कर रहा था। क्या अभियान पर भेजे जाने से पहले इस तरह की कोई पुख्ता जांच नहीं होती और चीजों को सामान्य मान कर चलने दिया जाता है? अगर ऐसा है तो यह बड़ी लापरवाही है जिसकी कीमत छह सैनिकों की शहादत के रूप में चुकानी पड़ी है। यह तो साफ है कि वायुसेना आधुनिक होने के भले कितने ही दावे करे, लेकिन तकनीकी खामियां दूर करने में संबंधित विभाग ने लापरवाही बरती है। युद्ध क्षेत्र में भेजे जाने वाले विमानों, हेलिकॉप्टरों को तो हमेशा पूरी तरह दुरुस्त रखा जाना चाहिए। एक भी छोटी-सी भूल जानलेवा बन सकती है। भारतीय वायुसेना को ऐसी घटनाओं से सबक लेने की जरूरत है। सवाल एक विमान या हेलिकॉप्टर की कीमत से कहीं ज्यादा बड़ा जाबांज सैनिकों की जिंदगी से जुड़ा होता है। अगर छोटी-छोटी लापरवाही, चूक ऐसे हादसों को जन्म देती रहेंगी तो कैसे हम दुश्मन के सामने टिक पाएंगे?

 

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