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संपादकीय: भ्रष्टाचार का पैमाना

अगर वैश्विक संदर्भ में देखें, तो इस बात से खुश हुआ जा सकता है कि बांग्लादेश और पाकिस्तान के मुकाबले हमारी स्थिति बेहतर है।

Author Updated: January 25, 2020 1:19 AM
वैसे भ्रष्टाचार के मामले में भारत की दुनिया में जो छवि बनी है, वह कोई नई बात नहीं है।

भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने को लेकर सरकार भले कितने दावे कर ले, लेकिन हकीकत यह है कि भ्रष्टाचार कहीं कम नहीं हुआ है, बल्कि बढ़ता जा रहा है। दावोस में चल रहे विश्व आर्थिक मंच के सम्मेलन में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने भ्रष्टाचार पर एक सौ अस्सी देशों की जो सूची जारी की है, उसमें इस बार भारत दो स्थान खिसक कर अस्सीवें स्थान पर चला गया है। पिछले साल यह अठहत्तरवें स्थान पर था। जाहिर है, भ्रष्टाचार कम होने के बजाय बढ़ा है। वैसे भ्रष्टाचार के मामले में भारत की दुनिया में जो छवि बनी है, वह कोई नई बात नहीं है। देश के भीतर हो या बाहर, सरकारों और प्रशासन से लेकर सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार जिस कदर व्याप्त हो चुका है, उसमें इसका खात्मा सिर्फ एक कल्पना भर से ज्यादा कुछ नहीं है। लेकिन ताज्जुब इस बात पर है कि एक चुस्त-दुरुस्त नौकरशाही और कड़े निगरानी तंत्र का दावा करने वाली सरकारें आखिर भ्रष्टाचार पर लगाम क्यों नहीं लगा पातीं! हालांकि अब ये कोई नया सवाल नहीं रह गया है। हकीकत तो यह है कि हम एक भ्रष्ट तंत्र में जीने के आदी हो गए हैं और भ्रष्टाचार को एक तरह से आत्मसात कर चुके हैं।

अगर वैश्विक संदर्भ में देखें, तो इस बात से खुश हुआ जा सकता है कि बांग्लादेश और पाकिस्तान के मुकाबले हमारी स्थिति बेहतर है। भ्रष्टाचार सूचकांक में बांग्लादेश एक सौ छियालीसवें और पाकिस्तान एक सौ बीसवें स्थान पर है। भारत के समकक्ष देशों में चीन, घाना, मोरक्को जैसे देश हैं। अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारत एक तरह से विकासशील देशों का नेतृत्व करने वाला देश माना जाता है। ऐसे में अगर भ्रष्टाचार के मामले में हम मोरक्को या घाना के साथ गिने जाते हैं तो यह बहुत ही शर्मनाक स्थिति है। ये छोटे अफ्रीकी देश हैं जहां जनता गरीबी, अशिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं से तो मरहूम है ही, राजनीतिक अस्थिरता और गुटीय संघर्ष भी बर्बादी का बड़ा कारण हैं। लेकिन भारत के हालात इनसे एकदम अलग हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा और परिपक्व लोकतंत्र है, दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। भले आंतरिक समस्याएं हों, पर राजनीतिक अस्थिरता नहीं है। इतना सब कुछ होने के बाद अगर हमारी सरकारें भ्रष्टाचार-मुक्त शासन नहीं दे पा रही हैं तो यह चिंताजनक बात है।

सवाल है कि फिनलैंड, स्वीडन, सिंगापुर, स्विटजरलैंड जैसे जो देश इस सूची में सबसे ऊपर हैं, जहां भ्रष्टाचार नहीं के बराबर है, जहां लोगों को काम कराने के लिए सरकार-प्रशासन को कोई घूस नहीं देनी पड़ती, उन देशों से हम क्यों नहीं कुछ सीखते। भारत में चाहे कारपोरेट घरानों की बात करें, या नगर निगम और पंचायत स्तर पर चले जाएं, भ्रष्टाचार को लेकर सब जगह एक-सी कहानी देखने-सुनने को मिलेगी। चुनाव आयोग ने भले आचार संहिता बना रखी हो और खर्च सीमा तय कर रखी हो, लेकिन चुनावों में उम्मीदवारों की ‘मदद’ के लिए अमीर, रसूखदार और उद्योग घराने किस कदर पैसा बहाते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। ये भ्रष्टाचार का बड़ा कारण है और यह सब निगरानी तंत्र की मौजूदगी में इस साफ-सुथरे से चलता रहता है कि पकड़ में भी नहीं आता। सरकारें अपने पसंदीदा उद्योगपतियों के लिए अनुकूल नीतियां बनाने से नहीं हिचकती हैं। इसी तरह निचले स्तर पर देखें तो आम लोगों को तमाम सरकारी सेवाओं के लिए आज भी घूस देने को मजबूर होना पड़ रहा है। जन्म प्रमाण पत्र बनवाने से लेकर बिजली के बिलों को ठीक करवाने के लिए भी घूस का चलन आम है। और ये सब तब है जब ज्यादातर सेवाएं आॅनलाइन की जा रही हैं। ऐसे में भारत कैसे भ्रष्टाचार मुक्त हो पाएगा?

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