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संपादकीय: दरकते रिश्ते

एक परिवार पर समूचे समाज की बुनियाद टिकी होती है। पति और पत्नी के बीच संबंधों में सहजता अगली पीढ़ियों की जमीन तैयार करती है कि वह समाज को कितना बेहतर बनाने के रास्ते पर आगे बढ़ता है।

Author April 25, 2019 12:50 AM
पुलिस ने रोहित शेखर मर्डर केस में उनकी पत्नी को गिरफ्तार किया है।

दिल्ली में रोहित शेखर की हत्या के मामले में पुलिस की तफ्तीश के दौरान अब तक जो परतें खुल पाई हैं, उनके मुताबिक उनकी पत्नी अपूर्वा ने इस कत्ल को अंजाम दिया। पुलिस के मुताबिक अपूर्वा ने अपना जुर्म कबूल कर लिया है और जाहिर है अब इस हत्याकांड की जांच शायद इसी सिरे से आगे बढ़े और अदालत में आखिरी तौर पर दोषी साबित होने के बाद सजा का भी निर्धारण हो। लेकिन इस घटना ने एक बार फिर इस ओर ध्यान खींचा है कि क्या हमारा समाज आपसी रिश्तों को संभाल पाने में इस कदर कमजोर होता जा रहा है कि अपने जीवन-साथी से अलग होने के लिए हत्या तक करने की नौबत आने लगी है! हो सकता है कि रोहित शेखर और उनकी पत्नी अपूर्वा के संबंध इस हद तक बिगड़ चुके थे या उनके बीच शिकायत का स्तर इतना ऊंचा हो गया था जिसे दुरुस्त कर पाना शायद मुमकिन नहीं था। लेकिन क्या किसी भी स्थिति में हत्या कर देना ही अकेला रास्ता था? अगर पुलिस के सामने अपूर्वा का कबूलनामा ही घटना की हकीकत है तो इस हत्या से पहले उनके मन में क्या संबंधों के अतीत से लेकर इसके कानूनी अंजाम तक का खयाल नहीं आ सका?

दरअसल, हत्या जैसी जघन्य घटना को अंजाम देने से पहले व्यक्ति इस तरह के विवेक से जुड़े प्रश्नों पर विचार की स्थिति में नहीं जा पाता। लेकिन एक सभ्य और संवेदनशील व्यक्ति से यह उम्मीद जरूर की जाती है कि वह अपने जीवन में अगर सकारात्मक स्थितियों के सुख को दर्ज करता है तो अपने सामने पैदा होने वाले नकारात्मक हालात का भी सामना करे और उसका उचित और मानवीय हल निकाले। जहां तक पति और पत्नी के रिश्ते का सवाल है तो एक दूसरे की इच्छाओं और अस्तित्व का खयाल रखना दोनों की ही जिम्मेदारी है। लेकिन कई बार जीवन-स्थितियां इतनी जटिल हो जाती हैं कि तत्काल कोई रास्ता नहीं सूझता। ऐसे में अगर थोड़े धीरज के साथ मुश्किलों का सामना किया जाए तो निश्चित रूप से दूरी के दुश्चक्र या प्रतिद्वंद्विता में फंस चुके रिश्तों को या तो संभाला जा सकता है या फिर एक मानवीय और न्यायपूर्ण हल तक पहुंचा जा सकता है। लेकिन आज के दौर में रिश्तों में जिस तरह के तनाव और दबाव बढ़ने लगे हैं, उसमें अक्सर ऐसी घटनाएं सामने आने लगी हैं जिनमें बहुत मामूली बातों के लिए भी पति अपनी पत्नी की हत्या कर देता है। अब इसके उलट घटनाएं भी सामने आने लगी हैं।

एक परिवार पर समूचे समाज की बुनियाद टिकी होती है। पति और पत्नी के बीच संबंधों में सहजता अगली पीढ़ियों की जमीन तैयार करती है कि वह समाज को कितना बेहतर बनाने के रास्ते पर आगे बढ़ता है। लेकिन आपसी तालमेल का अभाव, एक दूसरे की भावनाओं को नहीं समझ पाने, अधिकारों के हनन और कई बार संपत्ति से बेदखल किए जाने जैसी वजहों से वैसे रिश्तों की जमीन भी दरक जाती है, जिन्हें जरा-सी समझदारी और धीरज के साथ बेहद खूबसूरत बनाया जा सकता है। अगर किन्हीं हालात में कड़वाहटों को कम कर पाना या रिश्ते को फिर से पटरी पर ला पाना मुमकिन नहीं हो सकता है, तो वैसी स्थिति में एक दूसरे की इच्छा और व्यक्तित्व का सम्मान करते हुए कानूनी तरीके से संबंध-विच्छेद के रास्ते को भी अपनाया जा सकता है, जिसमें किसी के अधिकारों का हनन न हो और न्याय सुनिश्चित हो। लेकिन किसी भी हालत में हिंसा के रास्ते संबंध से छुटकारा पाने की कोशिश न केवल दो लोगों के रिश्ते, बल्कि समूचे समाज के लिए टूटन के त्रासद नतीजे तक ही पहुंचाएगी।

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