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संपादकीय: लापरवाही की आग

दिल्ली में आग की अनेक भीषण घटनाएं हो चुकी हैं। उपहार सिनेमा कांड को लोग आज तक नहीं भूल पाए हैं। हाल में करोलबाग के एक होटल में लगी आग का उदाहरण है, जिसमें कई लोग मारे गए थे।

Author Published on: August 19, 2019 1:22 AM
एम्स में आग के दौरान की तस्वीर।

तमाम जागरूकता अभियानों, चेतावनियों, बिजली और आग से होने वाली दुर्घटनाओं से सावधान करने वाले अत्याधुनिक उपकरणों के उपयोग के बावजूद संवेदनशील जगहों पर भी आग लगने की घटनाओं को रोकना चुनौती बना हुआ है। दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स में लगी आग इसका ताजा उदाहरण है। गनीमत है कि इस घटना में कोई हताहत नहीं हुआ। मगर एम्स में आग लगने की घटना कई तरह से चिंता की बात है। यह देश का सर्वाधिक प्रतिष्ठित सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्र है। यहां देश भर से गंभीर रूप से बीमार लोग आते हैं। यहां तक कि अनेक मंत्रियों, राजनेताओं आदि को भी गंभीर हालत में यहीं भर्ती कराया जाता है। यह न केवल चिकित्सालय, बल्कि चिकित्सा संबंधी गंभीर शोध का केंद्र भी है। इसलिए यहां हर तरह की सुरक्षा पर अधिक मुस्तैदी बरतने की अपेक्षा की जाती है। मगर शायद इस पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता। इसी का नतीजा है कि शनिवार की शाम एम्स के एक हिस्से में आग लग गई।

आग एम्स के सूक्ष्म जैविकी विभाग में लगी। इसकी वजह बिजली के तारों से उत्पन्न चिनगारी बताई जा रही है। हालांकि असली कारण का पता लगाने के लिए अज्ञात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई गई है और मामले की छानबीन चल रही है। संस्थान के जिस हिस्से में आग लगी, वहां कोई मरीज भर्ती नहीं था। उधर कक्षाएं लगती थीं और प्रयोगशालाएं थीं। वहीं सूक्ष्म जैविकी विभाग की संवेदनशील प्रयोगशाला भी थी, जिसमें कैंसर रोगियों की बायोप्सी वगैरह के नमूने रखे जाते थे, उनकी जांच से संबंधित कागजात थे। वह सब जल कर खाक हो गया। उन रोगियों को दुबारा एक लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। जब तक प्रयोगशाला दुबारा स्थापित नहीं हो जाती, दूसरे रोगियों को भी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। कोई भी प्रयोगशाला स्थापित करना आसान काम नहीं होता। इसमें साल भर का समय लग सकता है। गनीमत है, उस हिस्से में मरीज भर्ती नहीं थे, वरना बड़ी दुर्घटना हो सकती थी। इस लिहाज से यह गंभीर चिंता का विषय है।

दिल्ली में आग की अनेक भीषण घटनाएं हो चुकी हैं। उपहार सिनेमा कांड को लोग आज तक नहीं भूल पाए हैं। हाल में करोलबाग के एक होटल में लगी आग का उदाहरण है, जिसमें कई लोग मारे गए थे। मगर अग्निशमन संबंधी व्यवस्था के मामले में प्राय: लापरवाही का ही आलम देखा जाता है। यहां तक कि कई बार सरकारी मंत्रालयों के दफ्तरों में भी आग की लपटें उठ कर जरूरी दस्तावेज स्वाहा कर देती हैं। ऐसी जगहों पर लगने वाली आग को किसी कारखाने या झुग्गी बस्ती में लगने वाली आग की घटना की तरह नहीं देखा जा सकता, जहां अग्निशमन विभाग और संबंधित लोगों की मिलीभगत या मनमानी की वजह से दुर्घटनाएं घट जाती हैं। इन संवेदनशील जगहों की सुरक्षा को लेकर खासी सावधानी बरती जाती है, खासकर आग के मामले में। फिर भी ऐसी घटनाएं हो जाती हैं, तो इसमें सरकारी कामकाज का ढर्रा भी बहुत हद तक जिम्मेदार है। मशीनों को ठीक से बंद न करना, बिजली के स्विच, तारों वगैरह का ध्यान न रखा जाना, अग्निशमन संबंधी स्वचालित यंत्रों का रखरखाव ठीक न होना आदि भी बड़ा कारण है। जब तक इस प्रवृत्ति में सुधार नहीं आता, आग से होने वाली दुर्घटनाओं पर काबू पाना मुश्किल बना ही रहेगा।

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