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संपादकीय: गरीबी की चुनौती

भारत में राजनीतिक दलों के पास गरीबी एक बड़ा मुद्दा हमेशा से रहा है। हर चुनाव में गरीबी हटाने का वादा जरूर किया जाता है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आजादी के सात दशक बाद भी भारत गरीबी के चंगुल से मुक्त नहीं हो पाया।

Multidimensional Poverty Index, MPI, UN, UNDP, poverty, cooking fuel, sanitation, nurtition, Jharkhand, Oxford Poverty and Human Development Initiative, OPHI, 10 indicators, standard of living, india news, Hindi news, news in Hindi, latest news, today news in Hindiझारखंड का एक गरीबी रेखा के नीचे का परिवार।(प्रतीकात्मक तस्वीर)

शायद ही कोई साल ऐसा बीतता हो जब यह खबर नहीं आए कि भारत ने गरीबी दूर करने में और कामयाबी हासिल की। देश-विदेश स्थित संस्थानों के शोध अध्ययनों, सरकारी रिपोर्टों, विश्व बैंक आदि की रिपोर्टों से ही पता चलता है कि हमारी सरकार कितने करोड़ और गरीबों पर से गरीबी का कलंक मिटाने में कामयाब हुई है। भले हकीकत कुछ और हो, जो होती भी है, लेकिन फिलहाल जो ताजा वैश्विक सूचकांक आया है, वह बता रहा है कि गरीबी मिटाने में भारत सबसे तेजी से काम कर रहा है। यह सूचकांक संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम और आॅक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डवलपमेंट इनीशिएटिव ने मिल कर तैयार किया है। एक सौ एक देशों के इस सूचकांक में भारत सबसे पहले नंबर पर है। दरअसल, भुखमरी, कुपोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा और भ्रष्टाचार आदि के बारे में जो वैश्विक सूचकांक समय-समय पर आए हैं वे निराशाजनक तस्वीर ही पेश करने वाले रहे हैंं। इसलिए अगर गरीबी मिटाने में भारत के प्रयास सफल हो रहे हैं तो इससे बड़ी सुकून की बात और क्या हो सकती है!

भारत में राजनीतिक दलों के पास गरीबी एक बड़ा मुद्दा हमेशा से रहा है। हर चुनाव में गरीबी हटाने का वादा जरूर किया जाता है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आजादी के सात दशक बाद भी भारत गरीबी के चंगुल से मुक्त नहीं हो पाया। लेकिन पिछले दो दशक के दौरान समय-समय पर गरीबों की तादाद घटने के दावे किए जाते रहे हैं। अभी जो वैश्विक सूचकांक आया है उसके मुताबिक 2006 से 2016 के बीच यानी दस साल में सत्ताईस करोड़ गरीबों को गरीबी के दायरे से बाहर किया गया है। कुछ साल पहले विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया था कि वर्ष 2004 से 2011 के बीच भारत में गरीबों की संख्या 38.9 फीसद से घट कर 21.2 फीसदी रह गई। एक अमेरिकी शोध संस्था ने बताया था कि भारत में हर मिनट चवालीस लोग गरीबी से मुक्त हो रहे हैं। लेकिन भारत में गरीबी पर राजनेताओं से लेकर अर्थशास्त्री जिस तरह से चिंता जाहिर करते रहे हैं और हर चुनाव, हर बजट में गरीबी का खात्मा करने का वादा किया जाता रहा है उससे लगता है गरीबी मिटने के बजाय तेजी से पैर पसार रही है। ऐसे में इसे लेकर आने वाले आंकड़े संदेह से ज्यादा कुछ नहीं पैदा करते।

यह भी बहस और चर्चा का एक गंभीर विषय ही रहा है कि गरीबी है क्या। क्या जिसके पास खाने, रहने जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं, वही गरीब है? गरीबी के अंतरराष्ट्रीय मानकों में स्वास्थ्य, शिक्षा, काम करने के हालात, हिंसा आदि को शामिल किया गया है। चार साल पहले नीति आयोग के उपाध्यक्ष की अध्यक्षता में जो गरीबी उन्मूलन कार्यदल बनाया था, उसका एक काम गरीबी की व्यावहारिक परिभाषा तय करना भी था। सवाल है कि जब गरीबी की कोई मानक परिभाषा ही तय नहीं हो पाई तो फिर गरीब किसे मानेंगे? कहने को भारत दुनिया की तेज अर्थव्यवस्थाओं में शुमार हो चुका है, लेकिन आज भी आबादी का बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, पीने का साफ पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में आज भी दिमागी बुखार से बड़ी संख्या में बच्चे मर जाते हैं, लेकिन पिछले चार दशकों में इस बीमारी से निपटने के लिए सरकारों ने कुछ नहीं किया। यह एक मिसाल भर है। हकीकत तो यह है कि भारत आर्थिक विकास के जिस रास्ते पर चल रहा है उसने एक अमीर और गरीब के बीच खाई और बढ़ा दी है। इसलिए अगले एक दशक के भीतर गरीबी को पूरी तरह से खत्म करने का सरकार ने जो लक्ष्य तय किया है, वह कम चुनौतीभरा नहीं है।

 

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