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संपादकीय: सकारात्मक समझौता

पूर्वोत्तर के विद्रोही संगठनों का मन बदलने के पीछे कुछ वजहें साफ है। इस इलाके में विद्रोह की वजह विकास गतिविधियां संचालित न होने के अलावा केंद्र के साथ वहां के लोगों का कोई संवाद न रहना भी रही है।

Author Published on: August 12, 2019 12:59 AM
विद्रोही संगठनों पर नजर रखना सुरक्षा बलों के लिए चुनौती भरा काम रहा है।

पूर्वोत्तर लंबे समय से अशांत है। वहां कुछ अलगाववादी संगठन और कई जातीय संगठन सुरक्षा व्यवस्था के लिए लगातार चुनौतियां पेश करते रहे हैं। इन संगठनों पर कई बार लगाम कसने के लिए कड़े कदम उठाए गए, तो कई बार बातचीत के जरिए उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास भी हुए, मगर कोई उल्लेखनीय सकारात्मक नतीजा नहीं निकल सका। ऐसे में त्रिपुरा के एक विद्रोही समूह का केंद्र सरकार के साथ समझौते में हिंसा का रास्ता छोड़ने का संकल्प लेना और संविधान में विश्वास जताना आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से नई उम्मीद जगाता है। बताते चलें कि शनिवार को केंद्र सरकार, त्रिपुरा सरकार और सबीर कुमार देबवर्मा के नेतृत्व वाले नेशनल लिबरेशन फ्रंट आॅफ त्विप्रा; एनएलएफटी-एसडी ने हस्ताक्षर किए। इस समूह के अट्ठासी सदस्यों ने हथियार डाल कर मुख्यधारा में शामिल होने का संकल्प लिया। इस संगठन पर तीन सौ से ऊपर हिंसक घटनाओं के मामले दर्ज हैं। इस पर गैरकानूनी गतिविधियां निरोधक कानून के तहत प्रतिबंध लगा हुआ था। अब इसके साथ समझौते के बाद सरकार इनके आवास, शिक्षा और पुनर्वास संबंधी सुविधाएं जुटाएगी। इस समझौते से पूर्वोत्तर में सक्रिय दूसरे विद्रोही और अलगाववादी संगठनों के भी मुख्यधारा में लौटने की उम्मीद जगी है।

पूर्वोत्तर के मणिपुर, त्रिपुरा और नगालैंड में कई अलगाववादी संगठन सक्रिय हैं। इनके असंतोष की बड़ी वजह वहां विकास योजनाओं पर ध्यान न दिया जाना है। छिपी बात नहीं है कि ये राज्य लंबे समय से उपेक्षित रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरी बुनियादी सुविधाओं का वहां घोर अभाव है। इसलिए वे अलग होने की मांग करते हुए हिंसा का रास्ता अख्तियार करते रहे हैं। हालांकि हथियार के बल पर उन्हें मुख्यधारा में लाने और भारतीय संविधान में विश्वास जताने पर विवश करने की कोशिशें भी हुर्इं, कुछ संगठनों के साथ संघर्ष विराम के समझौते भी हुए, पर विकास कार्यक्रमों को ठीक से लागू न किए जा सकने की वजह से उनका असंतोष बार-बार फूटता रहा। इन संगठनों के असंतोष का शिकार ज्यादातर वहां तैनात सुरक्षा बल होते रहे हैं। चूंकि पूर्वोत्तर के इलाके दुर्गम हैं, वहां विद्रोही संगठनों पर नजर रखना सुरक्षा बलों के लिए चुनौती भरा काम रहा है। इन संगठनों का गुस्सा उन राजनेताओं पर भी फूटता रहा है, जो केंद्र के साथ निकटता बनाते रहे हैं। मगर अब शायद इन अलगाववादियों को यह समझ आने लगा है कि मुख्यधारा में शामिल होकर ही विकास कार्यक्रमों को आकार दिया जा सकता है। त्रिपुरा के विद्रोही संगठन एनएलएफटी के समझौते से यही संकेत मिलता है।

पूर्वोत्तर के विद्रोही संगठनों का मन बदलने के पीछे कुछ वजहें साफ है। इस इलाके में विद्रोह की वजह विकास गतिविधियां संचालित न होने के अलावा केंद्र के साथ वहां के लोगों का कोई संवाद न रहना भी रही है। केंद्र सरकार ने इस तरफ ध्यान केंद्रित किया। खासकर त्रिपुरा में 2015 में केंद्र सरकार ने एनएलएफटी के साथ बातचीत का सिलसिला शुरू किया। उसके बाद से इस संगठन ने किसी हिंसक घटना को अंजाम नहीं दिया। इसी तरह मणिपुर और नगालैंड के दूसरे संगठनों के साथ भी बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। एनएलएफटी के साथ हुए समझौते के बाद केंद्र सरकार ने कहा है कि वह त्रिपुरा सरकार की विकास योजनाओं संबंधी रूपरेखा पर भी गंभीरता से विचार कर रही है। इसी तरह पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों में भी विकास गतिविधियां तेज की गई हैं।

 

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