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संपादकीय: शब्दों की जगह

कई लोग तो उर्दू आदि भाषा के प्रयोग से परहेज करते देखे जाते हैं, जबकि दैनिक व्यवहार में वे शब्द घुलमिल चुके हैं।

Author Published on: January 27, 2020 1:16 AM
जो भाषा जितनी लचीली है और दूसरी भाषाओं के जितने अधिक शब्दों को अपने भीतर समाहित करने की क्षमता रखती है।

शब्दों का जीवन उनके प्रयोग पर निर्भर करता है, तो भाषा का उसकी ग्राह्यता और लचीलेपन पर। जो भाषा जितनी लचीली है और दूसरी भाषाओं के जितने अधिक शब्दों को अपने भीतर समाहित करने की क्षमता रखती है, वह उतनी ही समृद्ध और स्वीकृत होती जाती है। इस मामले में अंग्रेजी कुछ अधिक लचीली नजर आती है। आज दुनिया में भाषाओं का अस्तित्व कारोबारी गतिविधियां भी तय करती हैं। जो भाषा विश्व व्यापार के अनुसार खुद को बदलती, ढालती और प्रयोग में आ रहे नए शब्दों को ग्रहण करती चलती है, उसका जीवन उतना ही लंबा होता चलता है। इस लिहाज से भी अंग्रेजी अग्रणी दिखाई देती है। इसका एक प्रमाण आक्सफर्ड विश्वविद्यालय के शब्दकोश में हर साल चलन में आए नए शब्दों और दूसरी भाषाओं के शब्दों को भी अपने में समाहित करना है। इस साल इस कोश में कुल एक हजार नए शब्द जोड़े गए, जिनमें हिंदी समेत भारतीय भाषाओं के छब्बीस शब्द हैं। उनमें चावल, शादी, हड़ताल, डिब्बा जैसे शब्द शामिल हैं। इस तरह आक्सफर्ड विश्वविद्यालय डिक्शनरी में भारतीय भाषाओं से लिए गए कुल शब्दों की संख्या बढ़ कर तीन सौ चौरासी हो गई है। यह निस्संदेह हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओं के लिए गर्व का विषय है कि अंग्रेजी में भी उनके शब्द अपने मूल रूप में जगह बना रहे हैं।

मगर हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं के लिए यह प्रश्न भी पैदा होता है कि वे अपने शब्दों को सहेजने को लेकर कितनी सतर्क और संवेदनशील हैं। हिंदी का आलम यह है कि इसमें जो कोश वर्षों पहले तैयार हुए थे, उनके नए संस्करण तैयार करने की जरूरत ही नहीं समझी जाती, जबकि उनके पहले संस्करण के बाद से अब तक भाषा व्यवहार में हजारों नए शब्द आ जुड़े हैं। यों हिंदी अपने को विश्वभाषा की सूची में शामिल होने को आतुर है, कारोबारी गतिविधियों में भी इसका निस्संकोच उपयोग होने लगा है, पर हकीकत यह है कि शब्द संचय के मामले में यह कठोर ही नजर आती है। बहुत सारे लोग इस बात को लेकर बहस करते मिल सकते हैं कि अमुक श्ब्द अंग्रेजी, अरबी, फारसी या किसी अन्य भाषा का है, सो उसे क्यों हमें अपनी भाषा में समाहित करना चाहिए। कई लोग तो उर्दू आदि भाषा के प्रयोग से परहेज करते देखे जाते हैं, जबकि दैनिक व्यवहार में वे शब्द घुलमिल चुके हैं। ऐसे में अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि लोकभाषाओं में व्यवहृत होने वाले बहुत सारे शब्दों को संजोने के मामले में कैसी छुआछूत होगी।

अंग्रेजी ने अपने को लैटिन से मुक्त कर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई और बहुत तेजी से अपने को विस्तृत किया। इस तरह विज्ञान जैसे अनुशासनों में उसने लैटिन से पिंड छुड़ा कर अपनी शब्द संपदा तैयार कर ली। जबकि हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाएं आज भी नए शब्दों को गढ़ने के मामले में संस्कृत का दामन नहीं छोड़ पाई हैं। इससे उनके लिखित और दैनिक व्यवहार में उपयोग होने वाले शब्दों में प्राय: अंतर नजर आता है। बोलचाल की भाषा पर जोर होने के बावजूद यह कठिनाई अभी समाप्त नहीं हो पाई है। यहां तक कि बाजार के दबाव में बहुत सारी बोलियां तेजी से खत्म हो रही हैं, उनके शब्द ढूंढे नहीं मिलेंगे। जब तक भारतीय भाषाएं अपना स्वरूप लचीला नहीं बनाएंगी, तब तक सिर्फ आक्सफर्ड डिक्शनरी में अपने कुछ शब्दों के स्थान पाने पर गर्व करने से उनकी समृद्धि का गौरवगान पूरा नहीं होगा।

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