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संपादकीय: हादसों की सड़क

अब एक रिवायत की तरह सरकार की ओर से इस घटना की जांच के आदेश दे दिए गए हैं और पीड़ितों को राहत के रूप में इलाज और मुआवजे की घोषणा हो गई है।

Author July 9, 2019 1:12 AM
बस यमुना एक्सप्रेस-वे से करीब तीस फुट गहरे नाले में जा गिरी।

सोमवार तड़के यमुना एक्सप्रेस-वे पर जिस तरह का हादसा हुआ, उसने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर किया है कि आधुनिक और बेहतरीन सड़कें केवल रफ्तार के लिहाज से जरूरी हैं या फिर उन पर सफर का सुरक्षित होना पहले सुनिश्चित किया जाना चाहिए। लखनऊ से दिल्ली की ओर जा रही उत्तर प्रदेश परिवहन की एक बस यमुना एक्सप्रेस-वे से करीब तीस फुट गहरे नाले में जा गिरी। इस त्रासद हादसे में उनतीस लोगों की मौत हो गई और अठारह बुरी तरह घायल हो गए। इस हादसे को भी शायद सड़कों पर होने वाले आम हादसों की तरह देखा जाएगा और इसके कारण के रूप में किसी अप्रत्याशित स्थिति को जिम्मेदार मान लिया जाएगा। अब एक रिवायत की तरह सरकार की ओर से इस घटना की जांच के आदेश दे दिए गए हैं और पीड़ितों को राहत के रूप में इलाज और मुआवजे की घोषणा हो गई है। लेकिन क्या इस हादसे के बाद संबंधित महकमे इसके कारणों पर विचार करने के बजाय फिर से किसी बड़ी दुर्घटना के होने तक अगला कदम उठाने के लिए इंतजार करेंगे? इस तरह की कोई एक घटना बड़े सबक के लिए काफी होनी चाहिए। लेकिन ऐसा लगता है कि हर कुछ समय के बाद एक्सप्रेस-वे के हादसों के बावजूद सरकार या संबंधित महकमों की नींद नहीं खुलती।

इस हादसे की वजह फिलहाल बस के चालक को आई झपकी बताई जा रही है। अगर अंतिम तौर पर यही कारण बताया जाता है तो आखिर क्या वजह है कि तेज रफ्तार वाली सड़कों पर ऐसी व्यवस्था और निगरानी नहीं सुनिश्चित की जाती कि वाहन चलाते समय झपकी जैसी स्थिति में चालक किसी तरह की मामूली चूक भी नहीं करें। इसके लिए सहायक चालक से लेकर वाहन चलाते समय शरीर और दिमाग से पूरी तरह सक्रिय रहने के इंतजाम किए जा सकते हैं। लेकिन निर्धारित गति और दूसरे तमाम नियम-कायदों को भी पूरी तरह अमल में लाना किसकी जिम्मेवारी है? अच्छी और निर्बाध सड़क देख कर ऐसे तमाम चालक होते हैं, जो रफ्तार की सीमा को तोड़ कर वाहन चलाने में संकोच नहीं करते। उन्हें न दूसरों की जान की फिक्र होती है, न अपनी। लेकिन ऐसे बेलगाम लोगों को रोकने और उनके खिलाफ कार्रवाई अगर होती दिखे तो दूसरों को सबक मिल सकता है। लेकिन ऐसा लगता है कि एक्सप्रेस-वे के प्रबंधन में लगे संबंधित महकमे या समूहों को इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता।

कुछ समय पहले सूचनाधिकार कानून के तहत सामने आई जानकारी के मुताबिक यमुना एक्सप्रेस-वे पर पिछले करीब छह सालों के दौरान लगभग पांच हजार हादसे हुए, जिनमें सवा सात सौ लोगों की जान चली गई और साढ़े सात हजार से ज्यादा लोग घायल हुए। यह आंकड़ा अपने आप में यह बताने के लिए काफी है कि सुविधा की सड़क आज किस तरह हादसों की त्रासदी के नए अध्याय की गवाह बन रही है। दरअसल, एक्सप्रेस-वे पर किसी तरह की बाधा नहीं होती है, इसलिए उस पर गाड़ी चलाते हुए चालक एक तरह से खुद को बेफिक्र पाते हैं। इस क्रम में शरीर में सुस्ती आती है और नींद की झपकी की आशंका बनी रहती है। जाहिर है, मामला केवल नियम-कायदे लागू कराने वाली एजेंसियों से लेकर चालक की अपनी जिम्मेदारी और सावधानी से भी जुड़ा है। इसलिए एक्सप्रेस-वे पर सफर के लिए जो नियम-कायदे तय किए गए हैं, उन पर पूरी सख्ती से अमल हो, यह सुनिश्चित किए जाने की जरूरत है। वरना तेज रफ्तार और निर्बाध सड़कें एक ओर सुविधा का अहसास देंगी तो दूसरी ओर बड़े हादसों जैसे त्रासद नतीजे भी देंगी।

 

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