ताज़ा खबर
 

संपादकीय: संकट और मदद

सरकारी बैंकों की माली हालत सुधारने के लिए सरकार बैंकों को तिरासी हजार करोड़ रुपए की एक और किस्त देगी। अंदाजा है कि इससे बैंकों को संकट से उबरने में मदद मिलेगी। खासतौर से उन बैंकों को जो त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई (पीसीए) के दायरे में फंसे हैं। पिछले कुछ सालों में भारत के कई सरकारी बैंकों की हालत इतनी चरमरा गई कि कुछ बैंक तो दिवालिया होने जैसी हालत में आ गए, जबकि कुछ को बड़े बैंकों में मिला कर बचाया गया।

Author Published on: December 22, 2018 3:26 AM
प्रतीकात्मक फोटो। (PTI File Photo)

सरकारी बैंकों की माली हालत सुधारने के लिए सरकार बैंकों को तिरासी हजार करोड़ रुपए की एक और किस्त देगी। अंदाजा है कि इससे बैंकों को संकट से उबरने में मदद मिलेगी। खासतौर से उन बैंकों को जो त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई (पीसीए) के दायरे में फंसे हैं। पिछले कुछ सालों में भारत के कई सरकारी बैंकों की हालत इतनी चरमरा गई कि कुछ बैंक तो दिवालिया होने जैसी हालत में आ गए, जबकि कुछ को बड़े बैंकों में मिला कर बचाया गया। गंभीर संकटों से जूझ रहे बैंकों को फिर से खड़ा करने के लिए पिछले साल अक्तूबर में सरकार ने दो लाख करोड़ से ज्यादा की रकम बैंकिंग क्षेत्र में डालने की योजना बनाई थी। तब सरकार ने कहा था कि दो साल के भीतर बैंकों में यह पैसा डाला जाएगा, जिसमें से 18,139 करोड़ रुपए बजट के जरिए और एक लाख पैंतीस हजार करोड़ रुपए पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड के जरिए देने थे। बाकी पैसा बाजार से जुटाना था। लेकिन बाजार से पैसा जुटाने में बैंकों को ज्यादा कामयाबी नहीं मिली। उम्मीद की जा रही है कि अगले साल मार्च तक बैंक अट्ठावन हजार करोड़ रुपए जुटा लेंगे, पर हकीकत यह है कि बैंक अब तक चौबीस हजार करोड़ ही जुटा पाए हैं, यानी आधे से भी कम। ऐसे में बैंक बाजार के भरोसे बैठेंगे तो काम नहीं चलेगा। जो पैसा सरकार देगी उसी से बैंकों को जीवन मिलने की उम्मीद की जा रही है।

इस साल रिजर्व बैंक ने उन सरकारी बैंकों पर शिकंजा कसा था जो डूबते कर्ज की वजह से बैठ रहे थे। ऐसे बैंकों को केंद्रीय बैंक ने पीसीए की श्रेणी में डाल दिया था। उन पर सख्ती की गई और बड़े कर्ज देने पर पाबंदी लगा दी गई थी। इन बैंकों का एनपीए तेजी से बढ़ता जा रहा था। इसलिए अब तिरासी हजार करोड़ में से उन बैंकों को मदद दी जाएगी जो पीसीए के दायरे में तो हैं, लेकिन जिन्होंने पिछले कुछ महीनों में कर्ज वसूली में सुधार करके दिखाया है। इसके अलावा उन बैंकों को भी मदद मिलेगी जिनके पीसीए के दायरे में आने का खतरा बना हुआ है। बैंकों को दी जा रही इस संजीवनी से पहला फायदा यह होगा कि वे कर्ज देने की हालत में आ सकेंगे। हाल में रिजर्व बैंक और सरकार के बीच जो टकराव चला था, उसका एक बड़ा कारण पीसीए का मुद्दा भी था। सरकार चाहती थी कि इन बैंकों को पीसीए के दायरे से बाहर किया जाए और उन पर से कर्ज देने की पाबंदी हटाई जाए।

हकीकत यह है कि डूबे कर्ज की वसूली में बैंक नाकाम साबित हो रहे हैं। डूबे कर्जों को बेचने या डिफॉल्टरों की जायदाद नीलाम करने जैसे कदमों का भी खास फायदा नहीं हुआ है। देश के दस बड़े बैंक जून तिमाही में सिर्फ चौदह हजार करोड़ रुपए ही वसूल पाए थे। बैंकों के सामने दोहरा संकट यह है कि जहां वसूली की रफ्तार बेहद धीमी है, वहीं नया एनपीए बनने की रफ्तार थम नहीं रही। नीलामी की प्रक्रिया भी आसान नहीं है। जितना कर्ज होता है उसका एक चौथाई भी वसूल नहीं हो पाता। कुछ समय पहले आई रिजर्व बैंक की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट में साफतौर पर चेताया गया है कि बैंकिंग क्षेत्र के लिए और खराब वक्त आने वाला है। बैंकों की आर्थिक स्थिति और खराब होती है तो एनपीए का आंकड़ा मार्च 2019 तक 13.3 फीसद के पार जा सकता है। ऐसे में सरकार के अरबों के राहत पैकेज बैंकों को संकट से निकाल पाने में अगर कारगर हो पाते हैं, तो यह बड़ी उपलब्धि होगी।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 संपादकीय: निजता पर नजर
2 संपादकीय: जोखिम में पहरेदार
3 संपादकीय: लापरवाही के बोल
ये पढ़ा क्या?
X