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संपादकीय: नाकामी का धुआं

दरअसल, पिछले कुछ सालों में धान की फसल तैयार होने और उसके अवशेष के रूप में पराली से निजात पाने की अवधि जिस तरह बदली है, उससे उपजी समस्या पर गौर करने के बजाय सरकारों ने इसकी व्यापक अनदेखी की।

Author Published on: November 7, 2019 12:58 AM
India Toxic Airदिल्ली में वायु प्रदूषण बेहद खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। (AP Photo/Manish Swarup)

दिल्ली और आसपास के इलाकों में हवा की हालत जानलेवा होने की ओर बढ़ने के बावजूद इसके फिलहाल पहचाने गए कारणों से निपटने को लेकर संबंधित सरकारें जिस स्तर की अनदेखी बरत रही हैं, उससे यही लगता है कि उन्हें इस बेहद गंभीर संकट की कोई फिक्र नहीं है! खबरों के मुताबिक पंजाब में मंगलवार को खेतों में पराली जलाने की इस मौसम की सबसे ज्यादा घटनाएं दर्ज की गर्इं। वहां के किसानों ने पराली जलाने पर प्रतिबंध के बावजूद साढ़े छह हजार से ज्यादा जगहों पर अपने खेतों में पड़े फसल के अवशेषों के निपटान के लिए उनमें आग लगाई। नतीजतन, पिछले एक-दो दिनों में वायु की गुणवत्ता में थोड़ा सुधार हुआ ही था कि इतने बड़े पैमाने पर पराली जलाने के बाद फिर उसके बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है। यह स्थिति तब है जब एक दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पराली जलाने और उसकी वजह से प्रदूषण पैदा करने वालों से किसी भी तरह की सहानुभूति नहीं हो सकती। बुधवार को एक बार फिर शीर्ष अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को फटकार लगाते हुए कहा कि आप पूरी तरह नाकाम रहे हैं; अब समय आ गया है जब उन अधिकारियों को दंडित किया जाए, जिन्हें किसानों को पराली जलाने से रोकने की जिम्मेदारी दी गई थी।

दरअसल, पिछले कुछ सालों में धान की फसल तैयार होने और उसके अवशेष के रूप में पराली से निजात पाने की अवधि जिस तरह बदली है, उससे उपजी समस्या पर गौर करने के बजाय सरकारों ने इसकी व्यापक अनदेखी की। अगर फसल तैयार होने और कटने का समय सिमटा है और हवा के बहाव की वजह से पराली जलाना अब एक बड़ी समस्या बन गया है तो इसकी पहचान और विश्लेषण कर इसके हल का रास्ता निकालना किसकी जवाबदेही है? किसानों के सामने विकल्पों का अभाव पराली जलाने को उनकी मजबूरी बनाता है तो क्या सरकार को किसी ठोस योजना पर काम नहीं करना चाहिए, ताकि इस मुश्किल का सामना आसानी से किया जा सके? सवाल है कि अगर कई सालों से समस्या की शक्ल कमोबेश एक ही तरह की बनी हुई है तो संबंधित राज्यों की सरकारों ने इसके हल के लिए उचित कदम क्यों नहीं उठाए? आज अगर सुप्रीम कोर्ट के सामने इन सरकारों को फटकार लगाने की नौबत आ गई है तो इसमें क्या अस्वाभाविक है?

सही है कि आमतौर पर हल साल इस मौसम में हवा में प्रदूषण की समस्या गहराती है और इसके कई कारक होते हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों से लगातार पंजाब और हरियाणा में बड़े दायरे में खेतों में पड़े फसलों के अवशेषों के निपटान का कोई आसान विकल्प नहीं होने की वजह से वहां के किसान आग लगा कर उसे नष्ट करते हैं, ताकि नई फसल के लिए खेत खाली हो सकें। लेकिन इस क्रम में पराली में लगी आग से व्यापक पैमाने पर जो धुआं उठता है, वह आसपास के राज्यों की हवा को बुरी तरह प्रभावित करता है। खासतौर पर हवा का रुख दिल्ली की ओर होने की वजह से राजधानी में प्रदूषण की समस्या बेहद खतरनाक हो जाती है और लोगों के लिए सामान्य रूप से सांस लेना तक दूभर हो जाता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि दिल्ली या समूचे एनसीआर में व्यापक प्रदूषण के संकट के लिए अकेले पराली जिम्मेदार है। वाहनों, एयरकंडीशनर आदि से निकलने वाले कार्बन की वजह से हवा बिगड़ने के तथ्य पराली के प्रदूषण के शोर में दब जाते हैं। जरूरत इस बात की है कि इस गंभीर संकट की अनदेखी के बजाय एक व्यापक कार्ययोजना तैयार हो और उस पर शिद्दत से अमल हो।

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