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संपादकीय: कब बंद होगी जल की बर्बादी

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के हाल के आकलन के अनुसार देश में 351 नदियां प्रदूषित हैं। इनमें भी 45 प्रमुख नदियां बुरी तरह से प्रदूषित हैं, जो आने वाले सालों में नालों में तब्दील हो जाएंगी। यह तब है जब देश में पानी का कारोबार जोरों पर है। लगातार गिरते भूजल स्तर के कारण देश में पानी की भीषण किल्लत खड़ी हो रही है लेकिन सरकार अभी भी पानी के कारोबार पर कोई प्रभावी कदम नहीं उठा रही है। इसी का नजीजा है कि भारत दुनिया में सबसे अधिक भूजल का दोहन करने वाला देश बन गया है।

Author Published on: September 13, 2019 1:50 AM
सांकेतिक तस्वीर।

प्रदीप श्रीवास्तव

मानव सभ्यता का विकास नदियों के किनारे हुआ है इसलिए हमारा नदियों से गहरा रिश्ता है। दुर्भाग्य से आधुनिक जीवन शैली और सभ्यता दूरगामी परिणामों की जगह अल्पकालिक आवश्यकताओं पर ज्यादा ध्यान देती है, जिसका परिणाम है कि तालाब, झील, पोखर, नहर, नदियां आदि सभी प्रकार के जलस्रोत तेजी से सूख रहे हैं। पानी देने वाले हिमालय क्षेत्र में भी जल संकट पैदा होने लगा है। शिमला, मसूरी व नैनीताल जैसी जगहों पर पर्यटकों को जाने से रोकना पड़ रहा है। पानी को अंधाधुंध तरीके से बर्बाद किया जा रहा है। इसमें न सिर्फ नागरिकों की गलती है, बल्कि हमारे नीति निर्माता भी आने वाले जल संकट की गंभीरता को पूरी तरह से नहीं समझ रहे हैं जबकि जीवन शैली में थोड़ा-सा बदलाव भी जल संकट को काफी कम कर सकता है। हालात को देखते हुए सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर जल संचयन को लेकर काम भी शुरू हो गया है।

केंद्र सरकार ने जल शक्ति मिशन के तहत जल संचयन को लेकर कई अल्पकालिक व दूरगामी योजनाएं तैयार की हैं। इनमें वाटर हार्वेस्टिंग से लेकर तालाबों के अतिक्रमण को दूर करने तक की योजनाएं हैं। लेकिन ये योजनाएं भी तभी सफल हो सकती हैं, जब जनता को जागरूक करके इनमें उसकी भागीदारी सुनिश्चित की जाए। यहां गौरतलब है कि हमारे देश में 1951 में प्रति व्यक्ति जल की उपलब्ध्ता 5,177 घनमीटर थी, जो 2011 में घट कर कर मात्र 1,545 घन मीटर रह गई है। जानकारों की मानें तो आने वाले समय में जल की उपलब्धता बहुत तेजी से कम होनी है। सरकार का भी आकलन है कि 2025 तक प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता घटकर 1,341 घनमीटर और 2050 तक 1,000 घनमीटर के आसपास हो जाएगी। इसके बावजूद सरकारों का ध्यान हर घर में नल लगाकर पानी को बर्बाद करने पर है।

ये हालात तब पैदा हुए हैं जब नदियों को हमारे समाज में मां का दर्जा दिया गया है। देश में दस हजार से ज्यादा नदियां हैं। तालाब, पोखर, बावड़ी, कुएं आदि प्राकृतिक जल स्रोतों की संख्या लाखों में है। देश में हर साल करीब चार हजार अरब घनमीटर तक वर्षा होती है लेकिन वर्षा जल संचयन की संस्कृति हमने विकसित नहीं की है नतीजतन, 85 प्रतिशत से अधिक जल व्यर्थ बह जाता है। पानी की उपलब्धता कम होने की सबसे बड़ी वजह विकास के नाम पर नदी, तालाबों, कुओं आदि जलस्रोतों को पाट कर अधिकांश हिस्सों पर रिहायशी कॉलोनियां बना देना है। शहरों में जिस तरह से तालाब और झील गायब हो रहे हैं, उससे भी संकट बढ़ा है। पानी रिचार्ज नहीं हो रहा है जबकि दूसरी ओर हम पानी का अधिक से अधिक उपयोग कर रहे हैं। चेन्नई और मुंबई जैसे समुद्र किनारे बसे शहरों की हालत देखिए। एक ही बारिश में वे जलमग्न हो जाते हैं क्योंकि हर प्रकार के जलस्रोतों को पाट दिया गया है, जिससे न पानी रिचार्ज होता है और ही न बह कर समुद्र में जा पाता है।

सूखते तालाबों और नदियों के कारण जल संकट बढ़ा तो बोरवेल, हैंडपंप, नल आदि से भूजल का दोहन शुरू हो गया। इससे देश में औसतन हर साल भूजल स्तर 0.3 मीटर नीचे जा रहा है। यमुना किनारे बसे आगरा की स्थिति यह है कि यमुना का पानी पीने योग्य नहीं है। आगरा में जल संरक्षण को प्रोत्साहित करने के लिए वाटर रिचार्ज व हार्वेस्टिंग पर कार्य कर रही संस्था सेंटर फॉर अरबन एवं रीजनल एक्सेलेंसी (क्योर) ने सरकार के साथ मिलकर कुछ प्रयोग किए हैं। कालिंदी विहार मुहल्ला यमुना नदी से करीब एक किलोमीटर के दायरे में है लेकिन यहां दो सौ फीट पर भूजल है।

वह पानी भी पीने योग्य नहीं है। एक सरकारी स्कूल में पॉयलट प्रोजेक्ट के तहत वाटर हार्वेस्टिंग प्लांट लगाया गया, जिससे स्कूल के 200 बच्चों, मिड डे मील व दूसरे सभी कार्यों के लिए साल भर तक पानी की जरूरत पूरी हो जाती है। यहां एक सीजन में करीब 72 हजार लीटर पानी संचयन किया जाता है। हर सीजन में पानी को साफ करने और ज्यादा पीने लायक बनाने के लिए 1.5 किलोग्राम फिटकरी, 3 किलोग्राम चीनी व दो किलोग्राम नमक मिलाया जाता है। करीब पांच सालों से स्कूल ने बाहर से पानी नहीं लिया। यह बहुत ही कारगर है, लेकिन सरकारी व्यवस्था इस पर ज्यादा ध्यान नहीं देती है।

वाटर रिचार्ज और वाटर हार्वेस्टिंग जैसी पद्धतियों पर भी समाज व सरकार का कम ध्यान है, जिससे हम पानी का उपयोग तो कर लेते हैं लेकिन उसे वापस पृथ्वी को देते नहीं हैं। हालत यह है कि घरेलू उपयोग में भी हम करीब 80 फीसद पानी की बर्बादी कर देते हैं, जबकि थोड़ी-सी जानकारी व व्यवहार संबंधी आदतों में बदलाव करके हम बर्बाद होने वाले पानी को बचा सकते हैं। पानी की बर्बादी के कारण ही भारत जल तनाव (वाटर स्ट्रेस्ड) वाले देशों की श्रेणी में शामिल हो चुका है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के हाल के आकलन के अनुसार देश में 351 नदियां प्रदूषित हैं। इनमें भी 45 प्रमुख नदियां बुरी तरह से प्रदूषित हैं, जो आने वाले सालों में नालों में तब्दील हो जाएंगी। यह तब है जब देश में पानी का कारोबार जोरों पर है। लगातार गिरते भूजल स्तर के कारण देश में पानी की भीषण किल्लत खड़ी हो रही है लेकिन सरकार अभी भी पानी के कारोबार पर कोई प्रभावी कदम नहीं उठा रही है। इसी का नजीजा है कि भारत दुनिया में सबसे अधिक भूजल का दोहन करने वाला देश बन गया है। दूसरे नंबर पर चीन और तीसरे नंबर पर अमेरिका है।

देश में करीब छह हजार कंपनियां ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्स से पंजीकृत हैं जो पानी के कारोबार से जुड़ी हैं। ये कंपनियां पानी तो निकालती हैं लेकिन उसकी भरपाई के लिए कोई कार्य नहीं करतीं। आंकड़ों के अनुसार एक कंपनी हर घंटे औसतन 5 हजार लीटर से 20 हजार लीटर तक पानी निकाल लेती है। पानी निकालने व साफ करने की पूरी प्रक्रिया में करीब 35 फीसद पानी बर्बाद भी हो जाता है। लेकिन फिर भी यह उद्योग हर साल 15 फीसदी की दर से बढ़ रहा है।

आरओ का पानी भले ही स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हो लेकिन पानी को साफ करने की पूरी प्रक्रिया बहुत ही खराब है। यह पानी तो साफ करती है, लेकिन करीब 70 फीसदी पानी बर्बाद भी करती है, जिसका पीने के अलावा दूसरे कामों में प्रयोग कर सकते हैं। मोटे अनुमान के अनुसार एक आरओ एक लीटर पानी साफ करने की प्रक्रिया में तीन लीटर पानी बर्बाद करता है। पानी की बर्बादी के कारण ही पिछले आठ सालों में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता में 70 प्रतिशत की कमी आ चुकी है। केंद्रीय जलशक्ति मिशन के अनुसार अकेले दिल्ली में 1.1 बिलियन करोड़ लीटर पानी सीवेज बन जाता है। हालत यह है कि 2022 तक दिल्ली में पीने के लिए पानी मिलना मुश्किल हो जाएगा। इसके अधिकतर इलाके डार्क जोन में तेजी से तब्दील हो रहे हैं।

देश में घरेलू उपयोग के लिए केवल छह प्रतिशत और उद्योगों के लिए पांच प्रतिशत पानी की जरूरत होती है, जबकि 89 प्रतिशत पानी का उपयोग कृषि द्वारा किया जाता है। हम कृषि में पानी की खपत को रातोंरात तो कम नहीं कर सकते लेकिन बढ़ते जल संकट को देखते हुए कुछ तात्कालिक उपाय करने चाहिए। जैसे, कृषि क्षेत्र में ऐसी फसलें उगाई जाएं जो पानी कम सोखती हैं। इसके अलावा ऐसी फसलों पर अनुसंधान और नए बीज भी तैयार किए जा सकते हैं, जो भविष्य में कम पानी में अधिक पैदावार दे सकती हों।

जल संकट से निपटने का सबसे कारगर तरीका वर्षा जल का संचयन करना है। वर्षा जल न सिर्फ आरओ के पानी से ज्यादा लाभदायक है, बल्कि मुफ्त भी है। देश की बड़ी कपंनियां अपने भवनों में वर्षा जल संचयन के लिए रेन वाटर रिचार्जिंग सिस्टम लगाने लगी हैं, लेकिन अभी भी व्यापक स्तर पर इसका प्रयोग नहीं हो रहा है। रेन वाटर हार्वेस्टिंग (वर्षा जल संग्रहण) और रेन वाटर रिचार्जिंग (वर्षा जल पुनर्भरण) ऐसी प्रणाली है, जिससे पानी की बर्बादी नहीं के बराबर होती है। साथ ही हम अपने जल स्रोतों का दोहन भी कम कर देते हैं।

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