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संपादकीय: पानी पर पहरा

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत प्रीमियम की पूरी राशि सरकार की तरफ से देने और मक्का तथा अरहर की खरीद में मदद की योजना तैयार की है। इसके लिए किसानों को सरकार की वेबसाइट पर पंजीकरण करा कर बताना होगा

Author May 25, 2019 4:54 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

भूजल के गिरते स्तर और बढ़ते जल संकट से पार पाने के मकसद से हरियाणा सरकार ने एक सराहनीय कदम उठाया है। सरकार ने धान की खेती छोड़ कर मक्का और अरहर बोने वाले किसानों के लिए दो हजार रुपए प्रति एकड़ प्रोत्साहन राशि देने, पंद्रह सौ से अठारह सौ रुपए कीमत का मक्का और अरहर का बीज मुफ्त देने, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत प्रीमियम की पूरी राशि सरकार की तरफ से देने और मक्का तथा अरहर की खरीद में मदद की योजना तैयार की है। इसके लिए किसानों को सरकार की वेबसाइट पर पंजीकरण करा कर बताना होगा कि वे पहले कितने एकड़ जमीन पर धान की खेती करते थे और अब कितने एकड़ भूमि पर अरहर और मक्का की खेती करने जा रहे हैं। पंजीकरण के साथ ही दो सौ रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से रकम उनके खाते में डाल दी जाएगी। बाकी रकम भूमि सर्वेक्षण के बाद दी जाएगी। माना जा रहा है कि इससे काफी किसान धान की खेती छोड़ देंगे। इस तरह सिंचाई के लिए हो रहे अनावश्यक भूजल दोहन पर काबू पाया जा सकेगा।

पिछले काफी समय से हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अनेक इलाकों में किसान समय पूर्व धान की फसल लगाते आ रहे हैं। मई के महीने से ही धान की रोपाई शुरू कर देते हैं। इस तरह वे एक ही खेत में दो बार धान की फसल लगा लेते हैं। उनका मानना है कि इस तरह उन्हें धान से अधिक कमाई हो जाती है। धान दरअसल, बरसात के मौसम में बोई जाने वाली फसल है। इसकी सिंचाई में काफी पानी की जरूरत होती है। धान के खेत में हमेशा पानी बने रहना चाहिए। इस तरह जब गरमी के मौसम में धान की पैदावार ली जाती है, तो उसकी सिंचाई के लिए भूजल का जरूरत से ज्यादा दोहन करना पड़ता है। किसानों की समय पूर्व धान की फसल उगाने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए हरियाणा और पंजाब की सरकारें लगातार अपील करती रही हैं। कई बार उन्होंने कुछ कड़े कदम भी उठाए। पंजाब सरकार ने एक बार ऐसा करने वाले किसानों के खिलाफ भारी जुर्माने तक का प्रावधान कर दिया था। मगर समय पूर्व धान की फसल उगाने की प्रवृत्ति पर रोक नहीं लग पाई। ऐसे में हरियाणा सरकार की पहल को व्यावहारिक कहा जा सकता है, क्योंकि इससे किसानों को होने वाले नुकसान की भरपाई होगी।

हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाकों में धान की अच्छी किस्में पैदा होती हैं। वह चावल ऊंची कीमत पर बिकता है, इसलिए किसान इसकी फसल उगाना फायदेमंद मानते हैं। वे एक मौसम में धान की दो फसल लेना चाहते हैं। मगर हकीकत यह भी है कि कोई भी फसल जब अपने तय मौसम के बजाय पहले या बाद में उगाई जाती है, तो वह उचित पैदावार नहीं दे पाती। उसमें रोगों के आक्रमण की आशंका भी अधिक रहती है। सिंचाई, खाद, कीटनाशक आदि का खर्च बढ़ जाता है। उस फसल पर उत्पादन लागत सही समय में उगाई जाने वाली फसल की अपेक्षा काफी बढ़ जाती है। फिर जिस तरह मानसून की अवधि और बरसात की मात्रा लगातार घट रही है, उसमें धान की सिंचाई के लिए किसानों को लगातार भूजल पर निर्भर रहना पड़ता है, जो जल संकट का बड़ा कारण है। ऐसे में हरियाणा सरकार की पहल से इस दिशा में अच्छे परिणाम आ सकते हैं।

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