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संपादकीय: कानून की धज्जी

यह पहली घटना नहीं है, जब किसी अदालत में वकीलों ने इस तरह एकजुट होकर हिंसक गतिविधि को अंजाम दिया। तीस साल पहले भी इसी अदालत परिसर में पुलिस और वकीलों के बीच हिंसक झड़पें हुई थीं।

तीस हजारी कोर्ट में वकीलों और पुलिस के बीच झड़प फोटो सोर्स- सोशल मीडिया

जब कानून के रखवाले ही कानून की फिक्र न करें, तो समाज में अराजकता को बल मिलता है। मगर हैरानी की बात है कि समाज में बड़े-बड़े अपराधों की गुत्थी सुलझाने और अपराध रोकने का दावा करने वाले खुद मामूली बातों को अपने अहं से जोड़ लेते हैं और फिर आपराधिक गतिविधियों में शामिल हो जाते हैं। दिल्ली की तीसहजारी अदालत में पुलिस और वकीलों के बीच हिंसक भिड़ंत इसका ताजा उदाहरण है। कार पार्किंग को लेकर दोनों पक्ष खूनी हिंसा पर उतारू हो गए। अदालत परिसर में जहां विचाराधीन कैदियों को लेकर गए पुलिस वाहन खड़े थे, वहीं एक वकील ने अपनी गाड़ी खड़ी करनी चाही। इस पर पुलिसकर्मी ने उसे रोका तो विवाद बढ़ गया और फिर मामला हाथापाई तक पहुंच गया। इस पर पुलिस उस वकील को थाने ले गई और वहां उसकी पिटाई कर दी। इससे नाराज वकीलों ने अदालत परिसर में तैनात पुलिसकर्मियों पर हमला कर दिया। दोनों के बीच जम कर मारपीट हुई। वकीलों ने कई पुलिस वाहनों और अन्य गाड़ियों को आग लगा दी। इस घटना में पुलिसकर्मी और वकील पक्ष के कई लोग घायल हो गए। इस मामले को गंभीरता से लेते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने विशेष जांच टीम का गठन किया है।

यह पहली घटना नहीं है, जब किसी अदालत में वकीलों ने इस तरह एकजुट होकर हिंसक गतिविधि को अंजाम दिया। तीस साल पहले भी इसी अदालत परिसर में पुलिस और वकीलों के बीच हिंसक झड़पें हुई थीं। तब पुलिस ने तीसहजारी परिसर की सभी अदालतों में ताले जड़ दिए थे। हालांकि इस बार ऐसा नहीं हुआ, पर इस घटना से पुलिस और वकील दोनों की कानून के प्रति जवाबदेही पर अंगुलियां उठनी शुरू हो गई हैं। अदालत परिसर में ले जाए जाने वाले विचाराधीन कैदियों के लिए प्रवेश की जगह तय होती है। वहीं उनके वाहन ठहराए जाते हैं। दिल्ली की अदालतों में अक्सर संगीन अपराधियों के मामलों की सुनवाई होती है, इसलिए कैदियों की सुरक्षा को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरती जाती है। मगर हैरानी की बात है कि जिस वकील ने उस क्षेत्र में अपना वाहन खड़ा करने का प्रयास किया, उसने इस तकाजे को समझना जरूरी नहीं समझा। इसमें पुलिसकर्मियों से भी अपेक्षा की जाती थी कि वह अपनी ताकत के गुरूर में आने के बजाय नरमी से पेश आती और संबंधित प्राधिकार से अपनी शिकायत दर्ज कराती। मगर उसने वकील को थाने ले जाकर पिटाई कर दी।

दरअसल, ऐसी हिंसक घटनाएं अक्सर अपनी ताकत और हैसियत दिखाने की अविवेकपूर्ण जिद की वजह से हो जाती हैं। पुलिसकर्मियों को अक्सर देखा जाता है कि वे अपनी ताकत दिखाने के चक्कर में विवेक का इस्तेमाल करना भूल जाते हैं। इसी तरह वकीलों को लगता है कि वे कानून की बारीकियों का इस्तेमाल करते हुए अपने विरोध में खड़ी किसी भी अंगुली को मरोड़ सकते हैं। जबकि वकील का काम न्याय मांगने वालों की कानूनी मदद करना और न्यायाधीश के सामने उनके पक्ष में सही तथ्यों को पेश करना होता है। मगर इस घटना पर जैसा कि एक पुलिस अधिकारी ने कहा भी कि वकील खुद को कानून से ऊपर समझने लगते हैं। ऐसी अप्रिय घटनाओं पर रोक के लिए जरूरी है कि अपने कानूनी अधिकारों के बल पर ताकतवर महसूस करने वाले पुलिसकर्मियों और वकीलों की जवाबदेही तय हो।

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