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हिंसा का दायरा

अरुणाचल प्रदेश में छह गैर अरुणाचली जनजातियों को पीआरसी यानी स्थायी आवास प्रमाणपत्र देने के मसले पर पिछले कई दिनों से हिंसक माहौल बना हुआ है। हालत यहां तक पहुंच गई है कि बेलगाम और अराजक हो चुके लोगों ने वहां के उप-मुख्यमंत्री चाउना मीन के आवास पर हमला कर दिया और वहां आगजनी भी की।

Author February 26, 2019 4:23 AM
अरुणाचल प्रदेश में हिंसा रोकने के लिए तैनात किए गए आईटीबीपी के जवान। (Photo: ANI)

देश के अलग-अलग हिस्सों में वहां के स्थायी निवासियों और कथित बाहरी लोगों के बीच हितों के टकराव के मामले अक्सर सामने आते रहे हैं। कई बार अवसरों और अधिकारों के सवाल पर दो पक्षों के बीच हिंसक हालात पैदा हो जाते हैं। लेकिन ऐसे चिंताजनक मौके अनेक बार आने के बावजूद इस दिशा में न तो राजनीतिक दलों को प्रतिक्रिया जाहिर करने में सावधानी बरतना जरूरी लग रहा है और न सरकार को कोई भी कदम उठाने से पहले मामले की संवेदनशीलता समझने की जरूरत लग रही है। यही वजह है कि अरुणाचल प्रदेश में छह गैर अरुणाचली जनजातियों को पीआरसी यानी स्थायी आवास प्रमाणपत्र देने के मसले पर पिछले कई दिनों से हिंसक माहौल बना हुआ है। हालत यहां तक पहुंच गई है कि बेलगाम और अराजक हो चुके लोगों ने वहां के उप-मुख्यमंत्री चाउना मीन के आवास पर हमला कर दिया और वहां आगजनी भी की। अंदाजा लगाया जा सकता है कि कुछ समूहों को अगर सरकार में शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के साथ ऐसा बर्ताव करने का मौका मिल रहा है तो इसकी वजह सरकार की अदूरदर्शिता ही है कि उसने पीआरसी के मुद्दे के महत्त्व पर समय रहते विचार नहीं किया। अगर इस मुद्दे पर समय रहते जमीनी स्तर पर राज्य के नागरिकों और संगठनों का समर्थन हासिल करने की कोशिश की गई होती, तो आज सरकार के सामने यह नौबत नहीं आती।

गौरतलब है कि 1987 में असम से अलग राज्य का दर्जा मिलने के बाद से अरुणाचल प्रदेश के नामसाइ और छांगलांग में पिछले कई दशक से छह जनजातियों के करीब पच्चीस हजार लोग भी रह रहे हैं। लेकिन उनके पास स्थायी आवासीय प्रमाण पत्र नहीं है। इसकी वजह से उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसी के मद्देनजर पिछले साल मई में एक संयुक्त उच्चाधिकार प्राप्त समिति बनाई गई थी, जिसे यह तय करने की जिम्मेदारी दी गई है कि राज्य में बसने वाली छह गैर-अरुणाचली जनजातियों को वहां पीआरसी दिया जाए या नहीं। समिति ने गैर-अरुणाचली समुदायों को भी राज्य में पीआरसी देने की सिफारिश की थी। लेकिन उसके बाद राज्य में कई छात्र संगठनों सहित स्थानीय जनजातीय समूहों की ओर से तीखा और हिंसक विरोध खड़ा हो गया। विरोध जताने वाले लोगों और संगठनों का कहना है कि जिन समुदायों को पीआरसी मुहैया कराने की बात हो रही है, उससे स्थानीय आदिवासी समूहों के रोजगार और दूसरे अधिकारों या हितों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।

ऐसा लगता है कि शुरुआती तौर पर शायद सरकार इस विरोध के असर को कम करके आंक रही थी, जिसकी वजह से राज्य में हिंसा का दायरा फैल गया। अब सरकार ने पीआरसी पर अगला कदम उठाने से इनकार किया है, ताकि सबसे पहले हिंसा पर काबू पाया जा सके। सवाल है कि क्या सरकार को गैर-अरुणाचली जनजातीय समुदायों के मसले के हल के लिए किसी नीतिगत फैसले की घोषणा के असर का अंदाजा नहीं था? जिन जनजातियों को पीआरसी देने के सवाल पर ताजा विवाद शुरू हुआ, क्या उस पर स्थानीय समुदायों को तर्कपूर्ण तरीके से समझाने और उन्हें विश्वास में लेकर आगे नहीं बढ़ा जा सकता था? हिंसा के भयानक रूप लेने की एक वजह यह भी मानी जा रही है कि राज्य के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने नागरिकता संशोधन विधेयक का भी समर्थन किया था। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि असम सहित पूर्वोत्तर के राज्यों में नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर व्यापक असंतोष सामने आ रहा है। ऐसे में अगर आंतरिक मुद्दों को निपटाने और उसका सर्वमान्य हल निकालने में लापरवाही बरती जाती है तो स्थिति ज्यादा जटिल हो सकती है।

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