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संपादकीय: हिंसा की सियासत

विचित्र है कि इसमें पुलिस की भूमिका पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा के पीछे वजहें छिपी नहीं हैं। अक्सर कई लोग अपने कारोबारी या फिर दूसरे निजी हित साधने के मकसद से सत्ताधारी दल से नजदीकी बना लेते हैं।

कोलकाताममता बनर्जी (फोटो सोर्स – इंडियन एक्सप्रेस)

पश्चिम बंगाल में एक बार फिर हिंसा को लेकर राजनीति गरमा गई है। विजयादशमी वाले दिन मुर्शिदाबाद में एक शिक्षक के घर में घुस कर अज्ञात लोगों ने शिक्षक सहित उसकी गर्भवती पत्नी और एक छोटे बच्चे की हत्या कर दी। उसके बाद शनिवार को नदिया जिले में एक दुकानदार की उसकी पत्नी के सामने गोली मार कर हत्या कर दी गई। ये सभी लोग भाजपा के कार्यकर्ता बताए जा रहे हैं। इसे लेकर प्रांतीय भाजपा नेता और कार्यकर्ता विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका आरोप है कि ये हत्याएं राजनीतिक हैं और इनके पीछे तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का हाथ है। जबकि तृणमूल कांग्रेस इस आरोप को खारिज कर रही है। इस तरह एक बार फिर पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार भाजपा के निशाने पर है। सवाल है कि विजयादशमी के दिन से लेकर अब तक पुलिस मुर्शिदाबाद हत्याकांड में ठीक से जांच भी शुरू क्यों नहीं कर पाई है। इस पर राज्यपाल को दखल देना पड़ा है। हत्या की वजहें जो भी हों, पर उसमें अगर प्रशासन ढुलमुल रवैया बनाए रखे तो सरकार पर अंगुलियां उठनी स्वाभाविक हैं।

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का सिलसिला नया नहीं है। जब भी चुनाव नजदीक आते हैं या चुनाव की प्रक्रिया चल रही होती है, तो वहां हिंसक घटनाओं का सिलसिला बढ़ जाता है। लोकसभा चुनाव के दौरान बड़े पैमाने पर हुई हिंसा को लेकर अभी सरकार निशाने से बाहर नहीं आ पाई है कि हाल की घटनाओं ने उसे फिर से निशाने पर ला खड़ा किया है। वहां विधानसभा चुनाव का समय नजदीक आ रहा है, और बताया जा रहा है कि इसी कारण सियासी वैमनस्यता सिर उठाने लगी है। छिपी बात नहीं है कि वहां जो भी पार्टी सत्ता में रहती आई है, उसके और मुख्य प्रतिद्वंद्वी दल के कार्यकर्ता के साथ हिंसक झड़पें होती रही हैं। पहले ऐसी घटनाएं माकपा, कांग्रेस या फिर तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच हुआ करती थीं, अब ममता बनर्जी सरकार के आने के बाद तृणमूल और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच देखी जाने लगी हैं। जब भी ऐसी कोई हिंसक घटना होती है, दोनों में से कोई न कोई पार्टी पीड़ित पक्ष को अपना कार्यकर्ता बता कर दूसरे पर आरोप लगाना शुरू कर देती है।

विचित्र है कि इसमें पुलिस की भूमिका पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा के पीछे वजहें छिपी नहीं हैं। अक्सर कई लोग अपने कारोबारी या फिर दूसरे निजी हित साधने के मकसद से सत्ताधारी दल से नजदीकी बना लेते हैं। इस तरह उन्हें प्रशासनिक संरक्षण भी प्राप्त हो जाता है। जिस तरह ममता बनर्जी खुद अपने कार्यकर्ताओं को बचाने के लिए पुलिस थाने में पहुंच जाती रही हैं, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस तरह उनकी पार्टी के कार्यकर्ता महफूज महसूस करते होंगे। इसलिए आपराधिक घटनाओं पर काबू पाने के मामले में स्वाभाविक ही ममता बनर्जी सरकार पर अंगुलियां उठती रही हैं। संभव है, विपक्षी दलों के कुछ आरोप गलत हों, पर अगर ममता बनर्जी की सरकार आपराधिक घटनाओं पर रोक लगाने को लेकर सचमुच संजीदा होती, तो इस तरह हिंसक घटनाओं का सिलसिला न चलता रहता और न विरोध प्रदर्शनों की नौबत आती। कोई भी सरकार जब तक अपने दलगत स्वार्थों से ऊपर उठ कर राज्य में कानून-व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्ध नहीं होती, तब तक आपराधिक घटनाओं पर लगाम लगाना मुश्किल ही बना रहता है।

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