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संपादकीय: हिंसा के बीच

सवाल है कि देश का लोकतांत्रिक ढांचा बचाए रखने के लिए आयोजित चुनाव में शामिल पार्टियां अपने कार्यकर्ताओं को यह बात क्यों नहीं समझा पातीं कि हिंसा की छोटी वारदात भी मतदान प्रक्रिया को किस कदर बेअसर कर सकती है और इससे कैसे हमारा लोकतंत्र कमजोर होगा!

Author Published on: April 24, 2019 1:16 AM
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

मौजूदा लोकसभा चुनाव के दौरान देश के बाकी राज्यों की अपेक्षा पश्चिम बंगाल से जिस तरह हिंसा की खबरें आर्इं, उससे साफ है कि अभी तक वहां पूरी तरह स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करा पाना चुनाव आयोग के सामने एक बड़ी चुनौती है। हैरानी की बात यह है कि इसकी आशंका पहले से बनी हुई थी कि पश्चिम बंगाल में मतदान रोकने या मतदाताओं को डराने-धमकाने के मकसद से हिंसक घटनाएं हो सकती हैं। इसके मद्देनजर सुरक्षा इंतजामों में बढ़ोतरी भी की गई। इसके बावजूद राज्य के मुर्शिदाबाद में डोमकाल और रानीनगर के अलावा मालदा में भी हिंसा की खबरें सामने आर्इं। विडंबना यह है कि इसके पहले भी दोनों चरणों में पश्चिम बंगाल में मतदान की प्रक्रिया को बाधित करने के लिए हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया गया। तीसरे चरण में मुर्शिदाबाद के बालीग्राम में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़प हो गई, जिसमें वोट देने के लिए लाइन में खड़े एक युवक की जान चली गई। सख्त सुरक्षा इंतजामों के बावजूद इस घटना के बाद आलम यह था कि वहां अफरातफरी का माहौल पैदा हो गया और कड़ी मशक्कत के बाद ही सुरक्षा बलों को हालात पर काबू पाने में कामयाबी मिल सकी।

सवाल है कि देश का लोकतांत्रिक ढांचा बचाए रखने के लिए आयोजित चुनाव में शामिल पार्टियां अपने कार्यकर्ताओं को यह बात क्यों नहीं समझा पातीं कि हिंसा की छोटी वारदात भी मतदान प्रक्रिया को किस कदर बेअसर कर सकती है और इससे कैसे हमारा लोकतंत्र कमजोर होगा! उल्टे ज्यादातर जगहों पर कुछ राजनीतिक दल की ओर से अपने पक्ष में वोटिंग कराने के लिए मतदाताओं को अलग-अलग तरीके से प्रभावित करने से लेकर लालच और यहां तक कि धमकी देने तक के मामले सामने आते हैं। विडंबना यह है कि राज्य में लगभग सभी मुख्य पार्टियों को जहां इस तरह के हिंसक हालात नहीं पैदा होने देने की कोशिश करनी चाहिए, वहां कई बार उनके समर्थक खुद भी हिंसा में शामिल हो जाते हैं। अगर चुनाव में भाग लेने वाली पार्टियों को अपने समर्थकों की ओर से की जाने वाली ऐसी अराजकता से कोई परेशानी नहीं है तो क्या वे इस मामले में हिंसा कर सकने और अराजक स्थितियां पैदा करने में समर्थ समूहों को भी स्वीकार्यता नहीं दे रहे हैं? अगर यह प्रवृत्ति तुरंत सख्ती से नहीं रोकी गई तो क्या यह एक भयावह और जटिल हालात नहीं पैदा करेगी, जहां लोगों के वोट देने के अधिकार का हनन होगा और आखिरकार अराजक तत्त्वों को संसद में पहुंचने में मदद मिलेगी?

यों अमूमन हर बार चुनाव आयोग मतदान के समय साधारण लोगों को डराने-धमकाने, लोभ देने के साथ-साथ हिंसा करने से रोकने के लिए पुख्ता इंतजाम करता है। पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा का एक लंबा अतीत रहा है और आमतौर पर वहां हिंसा से मुक्त चुनाव कराना एक बड़ी चुनौती रही है। मगर हाल के वर्षों में चुनाव आयोग की सख्ती की वजह से उम्मीद की गई थी कि वहां हिंसा की घटनाओं में कमी आएगी। सवाल केवल यह नहीं है कि कुछ बूथों पर आतंक और हिंसक माहौल बना कर मतदाताओं को वोट देने से वंचित कर दिया जाए या फिर उनसे मनमाने तरीके मतदान कराया जाए। अगर यह स्थिति लगातार बनी रही तो ऐसी दशा में हुए चुनावों के नतीजे कितने विश्वसनीय माने जाएंगे! यह ध्यान रखने की जरूरत है कि पश्चिम बंगाल या देश के किसी भी हिस्से में हिंसा के माहौल में हुआ मतदान लोकतंत्र की कसौटी पर सवालों के घेरे में रहेगा!

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