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संपादकीय: वोट और हिंसा

मतदान के दौरान हिंसा की घटनाएं बिहार और कश्मीर से भी सामने आई हैं। मुंगेर में मतदान केंद्रों पर कब्जे की खबरें हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि मतदान केंद्रों पर तैनात सुरक्षा बल आखिर उस वक्त लाचार क्यों हो जाते हैं।

Author Published on: May 8, 2019 12:55 AM
mamataपश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

लोकसभा चुनाव के पांचवें चरण का मतदान निपट चुका है। इसमें सात राज्यों की इक्यावन सीटों के लिए वोट पड़े और दिग्गज उम्मीदवारों की तकदीर वोटिंग मशीनों में बंद हो गई। इनमें कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, सोनिया गांधी, केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह जैसे कई वीआइपी उम्मीदवार शामिल हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में मतदान का प्रतिशत पहले जैसा नहीं रहा। लेकिन पश्चिम बंगाल में पांचवें चरण में भारी मतदान के बीच फिर जो हिंसा देखने को मिली, उसका अंदेशा पहले से ही था। यों चुनाव देश भर में ही कड़े मुकाबले वाला और दिलचस्प बना हुआ है, लेकिन एक तरह से केंद्र बिंदु पश्चिम बंगाल है, जहां शुरू से लेकर अब तक एक भी चरण ऐसा नहीं रहा जिसमें हिंसा मुक्त चुनाव हुए हों। अगर छिटपुट घटनाओं को छोड़ दें तो पश्चिम बंगाल जैसी हिंसा अभी तक किसी राज्य में देखने को नहीं मिली है। ये हिंसक झड़पें बता रही हैं कि राज्य में चुनाव जीतने के लिए तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच किस कदर कड़ा मुकाबला है, जिसमें दोनों ही पक्षों को खुद पर नियंत्रण रखना जरूरी नहीं लग रहा। दोनों के लिए एक-एक सीट जीवन-मरण का सवाल बनी हुई है। उत्तर प्रदेश में भाजपा को जो नुकसान होता दिख रहा है उसकी भरपाई की उम्मीद शायद उसे पश्चिम बंगाल से है। जबकि राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के सामने अपना गढ़ बचाए रखने की चुनौती है। बंगाल की चुनावी हिंसा के मूल में यह बड़ा कारण है।

वहां चुनावी हिंसा चिंता का विषय इसलिए भी है कि भारी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती के बावजूद इस तरह की घटनाएं थम नहीं रहीं। वोट डालने जा रहे लोगों को र्इंट-डंडों से पीटने, धमकाने, बम विस्फोट, हमले जैसी घटनाएं हैरान करने वाली हैं। इससे पता चलता है कि पुलिस और सुरक्षा बल भी अपनी जिम्मेदारी निभा पाने में नाकाम साबित हो रहे हैं। पश्चिम बंगाल में पिछले चार चरणों में हिंसा की जो घटनाएं हुर्इं, उनसे चुनाव आयोग ने कोई सबक नहीं लिया। चुनाव के दौरान हिंसा न हो और मतदाता बिना किसी भय के वोट डालें, यह सुनिश्चित करना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है। सवाल है कि राज्य में राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के पास हथियार आ कहां से रहे हैं? स्थानीय पुलिस और खुफिया एजेंसिया कर क्या रही हैं? चुनावी हिंसा में लिप्त लोगों को काबू में क्यों नहीं किया जा पा रहा?

मतदान के दौरान हिंसा की घटनाएं बिहार और कश्मीर से भी सामने आई हैं। मुंगेर में मतदान केंद्रों पर कब्जे की खबरें हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि मतदान केंद्रों पर तैनात सुरक्षा बल आखिर उस वक्त लाचार क्यों हो जाते हैं। कश्मीर घाटी की अनंतनाग सीट के लिए तीन चरणों में मतदान पूरा हो चुका है और तीसरे चरण में ढाई फीसद से थोड़े ज्यादा ही वोट पड़े। हैरानी की बात तो यह है कि पुलवामा और शोपियां में पच्चीस फीसद मतदान केंद्रों पर तो एक वोट भी नहीं पड़ा। इसकी एक बड़ी वजह यह मानी जा सकती है कि लोग आतंकवादियों के खौफ से मतदान करने घरों से नहीं निकलते। लेकिन जब पूरा कश्मीर सेना और सुरक्षाबलों की छावनी बना हुआ है और आजकल खासतौर से जब चुनाव हो रहे हैं तो फिर लोगों में खौफ क्यों है? अगर सरकार यह सुनिश्चित नहीं कर पाती कि लोग बिना किसी खौफ के वोट डाल सकें, सिर्फ कश्मीर में ही नहीं सभी जगह, तो यह भय मुक्त, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने केदावे पर बड़ा सवालिया निशान है।

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