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संपादकीय: चिली में अशांति

चिली में अशांति की यह चिंगारी पिछले महीने मेट्रो रेल का किराया बढ़ाए जाने के बाद भड़की। इसके बाद तो देश भर में छात्र सड़कों पर उतर आए और फिर जनता भी इनके साथ आ गई।

प्रदर्शनकारी घरों को कब लौटेंगे, कह पाना मुश्किल है।

देश में आसमान छूती महंगाई, अमीर-गरीब के बीच बढ़ती खाई और सत्ता पर अमीरों के खास वर्ग के कब्जे से आक्रांत लोगों का गुस्सा जब फूटता है तो हालात बेकाबू होने से कोई नहीं रोक सकता और इसका नतीजा देशव्यापी हिंसा और प्रदर्शनों के रूप में सामने आता है। पिछले एक महीने से दक्षिण अमेरिकी देशों चिली, कोलंबिया, बोलीविया और इक्वाडोर ऐसे ही अशांत हालात से जूझ रहे हैं। चिली के हालात ज्यादा गंभीर हैं और इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि अगर राष्ट्रपति और विपक्षी दलों के बीच वार्ता जल्द ही किसी तार्किक समझौते तक नहीं पहुंची तो दक्षिण अमेरिका का अमीर माने जाने वाला यह देश गंभीर राजनीतिक और आर्थिक दुष्चक्र में फंस जाएगा। चिली में अशांति की यह चिंगारी पिछले महीने मेट्रो रेल का किराया बढ़ाए जाने के बाद भड़की। इसके बाद तो देश भर में छात्र सड़कों पर उतर आए और फिर जनता भी इनके साथ आ गई। महीने से देश भर में लाखों लोग सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं, इन्हें काबू करने के लिए सेना और पुलिस लाठी-गोली का इस्तेमाल कर रही है, अब तक तेईस से ज्यादा लोग पुलिस की गोली से मारे जा चुके हैं और घायलों की तादाद सैकड़ों में है, सुरक्षा बलों की पैलेट गन से तीन सौ लोगों की आंखों की रोशनी चली गई है। हालांकि देश के राष्ट्रपति ने अगले साल अप्रैल में जनमत संग्रह कराने और नए संविधान का मसौदा तय करने की मांग मान ली है और पूरी कैबिनेट को बर्खास्त कर देने जैसे कदम उठाए हैं, लेकिन प्रदर्शनकारी घरों को कब लौटेंगे, कह पाना मुश्किल है।

चिली के मौजूदा हालात बता रहे हैं कि लोगों में आज जो गुस्सा फूटा है, वह कोई एक दिन की देन नहीं है, बल्कि इसकी जडेÞं सरकार की आर्थिक नीतियों में मौजूद हैं। दरअसल चिली में आर्थिक असामनता जिस तेजी से बढ़ती चली गई, उससे लोगों का सरकार पर से भरोसा उठ गया है। चिली की सत्ता देश के कुछ ही अमीर परिवारों की मुट्ठी में है। अमीर परिवारों का यह गठजोड़ ही सत्ता तंत्र की मिलीभगत से सरकार चला रहा है। इसका नतीजा यह हुआ है कि लोगों के पास रोजगार नहीं है, महंगाई सर्वोच्च स्तर पर है, देश की मुद्रा गिर रही है, अधिकांश आबादी के लिए रोजाना की न्यूनतम जरूरतें पूरी करने के लिए भी पैसे नहीं हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और पेंशन जैसी सामाजिक सुरक्षा को लेकर सरकार ने आंखें मूंद रखी हैं। जाहिर है, ऐसे विषम हालात में लोगों का आक्रोश फूटेगा और देश हिंसा की आग में जलेगा।

कहने को चिली लोकतांत्रिक देश है, लेकिन वहां आज भी संविधान वही चल रहा है जो 1980 में सैन्य शासक अगस्टो पिनोशे ने लागू किया था। हालांकि इसमें समय-समय पर बदलाव किए गए, लेकिन एक तानाशाही सरकार का संविधान आज के वक्त में आम जनता के हितों के लिए कितना कारगर साबित हो रहा होगा, यह बड़ा सवाल है। सैन्य शासक के इस संविधान में शिक्षा और स्वास्थ्य को राज्य का विषय नहीं माना गया था। ऐसे में लोग इन दोनों बुनियादी अधिकारों से एक तरह से वंचित ही हैं। इसीलिए इस बार प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में संविधान बदलने की मांग भी है और सरकार को इस बार इस पर झुकने को मजबूर होना पड़ा है। चिली के हालात उन देशों की सरकारों के लिए भी बड़ा सबक होने चाहिए, जिनके यहां बेरोजगारी चरम पर है, जिनके अर्थतंत्र की लुटिया डूब रही है, लेकिन सरकारें बेपरवाह हैं।

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