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संपादकीय: वोट की कीमत

विडंबना यह है कि लोगों को उनके वोट के बदले मोबाइल फोन, घड़ी जैसे अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, चांदी की पायल या अन्य जेवर, रसोई के आधुनिक उपकरण, शराब, नशीले पदार्थ और नकदी देने की कोशिशें की गईं।

Author May 14, 2019 1:52 AM
अभी अंतिम चरण के मतदान होने हैं। (फोटो: इंडियन एक्सप्रेस)

किसी भी स्वस्थ और परिपक्व लोकतंत्र में होने वाले चुनावों के जरिए सरकार बनाने के लिए राजनीतिक दलों को क्या करना चाहिए? सत्रहवीं लोकसभा के लिए होने वाले चुनावों के दौरान चुनाव आयोग की ओर से हुई कार्रवाई में जिस तरह की चीजें जब्त हो रही हैं, उससे यही लगता है कि उम्मीदवारों ने आम मतदाताओं का वोट हासिल करने के लिए अवैध और अनैतिक रास्ते अख्तियार करने में जरा हिचक नहीं दिखाई। जबकि जरूरत इस बात की है कि मतदाताओं के सामने जरूरी मुद्दों पर अपना पक्ष रखा जाए और उसके आधार पर उनका समर्थन मांगा जाए। मगर विडंबना यह है कि लोगों को उनके वोट के बदले मोबाइल फोन, घड़ी जैसे अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, चांदी की पायल या अन्य जेवर, रसोई के आधुनिक उपकरण, शराब, नशीले पदार्थ और नकदी देने की कोशिशें की गर्इं। चुनाव आयोग की अब तक की कार्रवाई में इस मकसद से इधर-उधर की जा रही जितनी सामग्री जब्त की गई है, उसकी कीमत तीन हजार चार सौ करोड़ रुपए तक पहुंच गई है। पिछले लोकसभा चुनाव में यह आंकड़ा बारह सौ करोड़ रुपए था।

कोई भी स्वतंत्र या फिर किसी राजनीतिक दल की ओर से चुनाव लड़ रहा उम्मीदवार अगर जनता के सामने अपनी राजनीति के सिद्धांत, लोगों के जीवन से लेकर देश और समाज के विकास से जुड़े मुद्दों के बजाय लालच का विकल्प रखता है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि जीत के बाद उसके काम करने का तरीका कैसा होगा! यानी कोई व्यक्ति अगर खुद ही वोट के बदले एक तरह की रिश्वत के तौर पर नकदी, शराब या कोई अन्य सामान देने जैसे भ्रष्ट आचरण की बुनियाद पर खड़ा होता है तो वह अपने काम में ईमानदारी और पारदर्शिता कैसे ला सकेगा! खासतौर पर जब देश में भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या हो, तो मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए अनैतिक और भ्रष्ट तरीके अपनाने वाले उम्मीदवारों से देश के कैसे भविष्य की उम्मीद की जा सकती है? हैरानी की बात है कि जिस दौर में देश में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था से लेकर आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े तमाम मुद्दे ईमानदारी से संबोधित किए जाने और उन पर वास्तव में अमल होने की बाट जोह रहे हैं, वैसे समय में भी कुछ उम्मीदवार महज चुनाव जीतने के लिए मतदाताओं को परोक्ष रूप से रिश्वत देने की कोशिश करते हैं!

क्या यह इसलिए संभव हो पा रहा है कि आज भी आम जनता के बीच पर्याप्त राजनीतिक जागरूकता का विकास होना कहीं बाकी है? यह हकीकत है कि हमारे देश की एक बड़ी आबादी आज भी अपनी रोजाना की जिंदगी में जद्दोजहद करते हुए कई तरह के अभावों से जूझती है। न्यूनतम सुविधाओं और जरूरत के सामानों से भी वंचित कुछ लोगों को जब कोई मामूली सामान देता है तो वे कुछ वक्त के लिए उसके प्रभाव में आ जाते हैं। शिक्षा और जागरूरता की कमी और अभावों से दो-चार जीवन में राजनीतिक चेतना का विकास होना कई बार जटिल होता है। ऐसे में बहुत सारे लोग एक नागरिक के तौर पर अपने अधिकारों को लेकर सजग नहीं हो पाते हैं। इसी का फायदा उठा कर कुछ उम्मीदवार उन्हें कोई सामान या नकदी देकर उनका वोट हासिल करने की कोशिश करते हैं। सवाल है कि मतदाताओं का समर्थन हासिल करने के लिए इस रास्ते को अपनाने वाले उम्मीदवार क्या चुनाव जैसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित नहीं कर रहे हैं? जाहिर है, देश की जनता के राजनीतिक प्रशिक्षण और जागरूकता के लिए ठोस पहलकदमी की जरूरत है, ताकि भविष्य में मुद्दों के बजाय लालच के आधार पर वोट मांगने वाले उम्मीदवारों को जनता अपने स्तर पर ही सबक सिखा सके।

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