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संपादकीय: घाटी के घाव

घाटी में अनुच्छेद तीन सौ सत्तर हटने का विरोध अब नए ढंग से भी सुगबुगाने लगा है। वहां से आने वाली सेबों की खेप में सेबों पर पाकिस्तान के समर्थन और भारत के विरोध में नारे लिखे मिले।

Author Published on: October 18, 2019 1:39 AM
अनुमान था कि इस तरह घाटी के लोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लौटना शुरू कर देंगे और लोकतंत्र पर उनका भरोसा बढ़ेगा।

जम्मू-कश्मीर में जन-जीवन सामान्य करने के लिए प्रतिबंध क्या हटने शुरू हुए, चरमपंथी गतिविधियों ने सिर उठाना शुरू कर दिया है। हालांकि इसकी आशंका पहले से थी। खूफिया सूचनाएं मिल रही थीं कि जैसे ही प्रतिबंध हटेंगे, वहां चरमपंथी गतिविधियां बढ़ सकती हैं। इसीलिए घाटी में कर्फ्यू हटाने और संचार सुविधाओं की बहाली में करीब ढाई महीने लग गए। मगर विपक्षी दल इस बात को लेकर सरकार पर हमलावर थे कि वह घाटी के लोगों के मूलभूत अधिकारों का हनन कर रही है। पाकिस्तान भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गुहार लगाता फिर रहा था कि पूरे जम्मू-कश्मीर को एक जेल में तब्दील कर दिया गया है।

वहां के लोगों का दमन हो रहा है। इसे देखते हुए सरकार ने चरणबद्ध तरीके से प्रतिबंध हटाने शुरू कर दिए। फिर वहां ब्लॉक विकास परिषद के चुनाव भी कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी। अनुमान था कि इस तरह घाटी के लोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लौटना शुरू कर देंगे और लोकतंत्र पर उनका भरोसा बढ़ेगा। मगर चरमपंथी संगठन जैसे पहले से तैयार बैठे थे कि मौका मिलते ही वे अपनी साजिशों को अंजाम देंगे। इसी का नतीजा है कि जम्मू-कश्मीर में कठुआ, पुलवामा, शोपियां, पुंछ, अनंतनाग आदि जगहों पर आतंकी सक्रियता बढ़ गई। उन्होंने शोपियां में एक फल बिक्रेता और पुलवामा में एक दिहाड़ी मजदूर की गोली मार कर हत्या कर दी।

घाटी में अनुच्छेद तीन सौ सत्तर हटने का विरोध अब नए ढंग से भी सुगबुगाने लगा है। वहां से आने वाली सेबों की खेप में सेबों पर पाकिस्तान के समर्थन और भारत के विरोध में नारे लिखे मिले। उन नारों में आतंकवादियों का समर्थन भी जताया गया था। हालांकि यह सेब किसानों या सामान्य फल विक्रेताओं का विरोध नहीं जान पड़ता। निश्चित रूप से इसके पीछे भी चरमपंथी गुटों का हाथ होगा। वहां सशस्त्र बलों का सख्त पहरा है, आतंकवादियों के लिए किसी बड़ी साजिश को अंजाम देना आसान नहीं है। इसलिए वे अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के मकसद से ऐसी हरकतें कर रहे हैं, जो उनकी खीज का पता देती हैं। शायद उन्हें लगता होगा कि इस तरह वे स्थानीय लोगों का समर्थन हासिल कर सकेंगे, पर यह भ्रम ही साबित होगा। मगर उनकी ये हरकतें सरकार और सशत्रबलों के लिए एहतियात बरतने के संकेत तो हैं ही।

जम्मू और लद्दाख संभाग में पहले भी कोई बड़ी चुनौती नहीं थी, सबसे बड़ी चुनौती कश्मीर में थी। वहीं पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों की पैठ हो पाती है और वे अशांति फैलाने का प्रयास करते हैं। हालांकि अलगाववादी संगठनों पर नकेल कसी जा चुकी है, विपक्षी राजनीतिक दलों की गतिविधियां भी शिथिल हैं, इसलिए उनके घाटी के आम लोगों को उकसाने की संभावना फिलहाल नहीं दिखती। पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि वहां के युवाओं में एक प्रकार का आक्रोश दबा हुआ है।

चरमपंथी और अलगाववादी ताकतों, कट्टरपंथी नेताओं के बहकावे में आकर वे पहले भी आजाद कश्मीर की मांग के साथ सड़कों पर उतरते रहे हैं। इसलिए विशेष राज्य का दर्जा समाप्त होने के बाद उनमें आक्रोश और बढ़ा है। वह फूटने का रास्ता तलाश रहा है। उसी को रोकने के प्रयास किए जाने जरूरी हैं। हालांकि सीमा पार से मिल रही मदद रुक जाने से वे अपने पांव नहीं पसार सकते, पर बाहरी मजदूरों, व्यापारियों, अधिकारियों आदि को निशाना बना कर अपना आक्रोश जाहिर करेंगे। अब सरकार और सुरक्षाबलों को इससे पार पाने पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है।

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