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संपादकीय: घाटी के हालात

पिछले महीने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटाए जाने के बाद से राज्य में बनी स्थिति को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं।

Author Updated: September 18, 2019 8:00 AM
सांकेतिक तस्वीर।

कश्मीर में हालात सामान्य बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के कदम से यह उम्मीद बंधती है कि घाटी के जिलों में जनजीवन जल्द पटरी पर लौटेगा। हालांकि सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार को कोई निर्देश नहीं दिया है, लेकिन जो कहा है वह भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाले पीठ ने कुछ याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कहा कि आंतरिक सुरक्षा और राष्ट्रहित को देखते हुए सरकार को ऐसे कदम तत्काल उठाने चाहिए, जिनसे जनजीवन सामान्य हो सके। पिछले महीने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटाए जाने के बाद से राज्य में बनी स्थिति को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। रोजाना खबरें आ रही हैं और टीवी चैनलों की रिपोर्टों में भी देखने को मिल रहा है कि घाटी में सब बंद जैसा ही है। पूरा क्षेत्र एक तरह से कैदखाने में तब्दील हो चुका है। घाटी में लंबे समय से संचार सेवाएं ठप-सी हैं। सड़कों पर सन्नाटा है। काम-धंधे भी बंद हैं। स्कूल खुल नहीं रहे। सड़कों पर फौज और सुरक्षा बल चप्पे-चप्पे पर गश्त दे रहे हैं। अखबार छप तो रहे हैं, लेकिन जर्बदस्त प्रतिबंधों के बीच। ये सारी स्थितियां बता रही हैं कि घाटी में सब कुछ सामान्य नहीं है। इन्हीं हालात के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट में कुछ याचिकाएं दाखिल की गई थीं।

इसमें कोई दो राय नहीं कि इस वक्त घाटी के हालात संवेदनशील हैं। अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करते वक्त सरकार को शायद इस बात का अंदाजा था कि इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप क्या हो सकता है। इसीलिए सुरक्षा की दृष्टि से पहले ही पूरी घाटी में चाक-चौबंद इंतजाम किए गए थे और संचार साधनों, जैसे लैंडलाइन फोन, मोबाइल फोन, इंटरनेट सेवाएं, टीवी चैनलों का प्रसारण पूरी तरह से बंद कर दिया गया था। लेकिन सच यह है कि इससे लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। कश्मीर में पाबंदियों के बारे में जो याचिकाएं दायर की गई थीं, उनमें खासतौर से इन्हीं मुद्दोंको उठाया गया था। हालांकि सरकार के दावे शिकायतों के उलट हैं। सर्वोच्च अदालत में इन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से जो जवाब पेश किए गए, उनसे तो यही लगता है कि घाटी में सब कुछ सामान्य है। सबसे चौंकाने वाली बात उस याचिका में आई, जिसमें कहा गया था कि जरूरतमंद लोग जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। इस पर प्रधान न्यायाधीश को यह कहना पड़ा कि अगर ऐसे हालात हैं तो वे खुद कश्मीर जा सकते हैं।

यह भी सच है कि कश्मीर घाटी में सरकार के लिए कोई एक चुनौती नहीं है। उसके लिए परेशानी का सबसे बड़ा कारण पाकिस्तान की ओर से है। ऐसी खबरें आ रही हैं कि पाकिस्तानी फौज बड़ी संख्या में आतंकवादियों को कश्मीर में घुसपैठ करा कर हालात बिगाड़ने की साजिश रच रही है। पाकिस्तान ने युद्ध जैसे हालात बना रखे हैं और रोजाना युद्ध की धमकियां दे रहा है। फिर केंद्र सरकार को यह भी डर है कि अगर सारी पाबंदियां हटा ली गर्इं तो अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाने के विरोध में उसे स्थानीय लोगों के हिंसक विरोध का सामना कर पड़ सकता है और आतंकवादी इसका पूरा फायदा उठाएंगे। श्रीनगर में चौबीस से ज्यादा आतंकवादी तो खुलेआम घूमने की बात खुद वहां के पुलिस प्रमुख ने मानी है। यह सही है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है और होनी भी चाहिए, लेकिन इस बात का भी ध्यान रखा जाना जरूरी है कि आम नागरिकों को हालात की कीमत न चुकानी पड़े।

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