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संपादकीय: बेकाबू महंगाई

खासतौर पर खाद्य पदार्थों की कीमतों में जिस तेजी के साथ बढ़ोतरी हुई है, उसका सीधा असर आम घरों की थाली पर पड़ेगा।

Author Published on: November 15, 2019 2:58 AM
गौरतलब है कि रिजर्व बैंक ने अनुमान लगाया था कि खुदरा महंगाई की दर चार फीसद तक पहुंच सकती है।

अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के दावे पेश करती सरकार के लिए महंगाई के ताजा आंकड़े झटका देने वाले हैं। आम लोगों की रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी एक बड़ी चुनौती साबित होने लगा है। खुद सरकार की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक खुदरा महंगाई की दर 4.62 फीसद तक पहुंच चुकी है। यह पिछले सोलह महीने के दौरान सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंची महंगाई है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि बीते कुछ सालों से केवल आर्थिक चकाचौंध के दावों के बीच साधारण लोगों के सामने ये हालात क्यों आए कि बाजार उनकी पहुंच से दूर होने लगा है! खासतौर पर खाद्य पदार्थों की कीमतों में जिस तेजी के साथ बढ़ोतरी हुई है, उसका सीधा असर आम घरों की थाली पर पड़ेगा। सिर्फ इतने से यह समझा जा सकता है कि जब लोगों के सामने खाने-पीने की वस्तुएं खरीदना ही चुनौती बनता जा रहा है तो वे बाजार से दूसरी चीजें खरीदने के बारे में कैसे सोचें!

गौरतलब है कि रिजर्व बैंक ने अनुमान लगाया था कि खुदरा महंगाई की दर चार फीसद तक पहुंच सकती है। लेकिन इस अनुमान को पार करते हुए ताजा आंकड़ों में महंगाई का स्तर 4.62 फीसद तक पहुंच गया, वहीं खाद्य पदार्थों के मामले में यह 7.9 फीसद तक पहुंच गई, जो पिछले उनतालीस महीनों का उच्च स्तर है। खासतौर पर सब्जियों, चावल, दाल और अन्य खाद्य उत्पाद, फल, मांस-मछली, अंडा आदि की कीमतों में जिस तेजी से बढ़ोतरी हुई है, उसका असर बाजार में लगभग सभी वस्तुओं की सामान्य खरीदारी पर पड़ना तय है।

हालांकि यह एक आम हकीकत है कि बाजार में अगर किसी वस्तु की मांग कम होती है, तो उसकी कीमतें भी घटती हैं। इस लिहाज से देखें तो यह सवाल लाजिमी है कि क्या अनिवार्य खरीदारी वाले खाद्य पदार्थों के मामले में व्यवस्थागत मोर्चे पर अनदेखी की जा रही है और इन वस्तुओं की महंगाई अब बेलगाम होने लगी है? यही नहीं, आर्थिक मामलों के विशेषज्ञों ने आने वाले महीनों में महंगाई की दर में और बढ़ोतरी की आशंका जताई है और अगर यह जारी रहा, तो इसका असर रिजर्व बैंक के रेपो रेट के निर्धारण पर भी पड़ सकता है।

दरअसल, सब्जियों की कीमतों के आसमान छूने की एक वजह यह हो सकती है कि इन महीनों के दौरान जो फसल तैयार हो जाती थी, उसमें इस बार कुछ देरी हो गई है। इसके बावजूद सब्जियों सहित अन्य खाद्य वस्तुओं के बाजार में पहुंचने से लेकर थोक बिक्री और फिर खुदरा कीमतों के मामले में निगरानी की अनदेखी और अव्यवस्था से इनकार नहीं किया जा सकता है। यह किसी से छिपा नहीं है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें कहां पहुंच गई हैं और इसका सीधा असर वस्तुओं की ढुलाई पर आने वाले खर्च पर पड़ता है। इसलिए केवल फसलों के तैयार होने में देरी के पहलू पर जोर देना कई वास्तविक कारणों को ढकने की तरह ही है।

यह ध्यान रखने की जरूरत है कि एक ओर खाद्य वस्तुओं की कीमतें आम लोगों की पहुंच से दूर हो रही हैं तो दूसरी ओर औद्योगिक उत्पादन में लगातार गिरावट चिंता का विषय बनी हुई है। रोजगार और लोगों की आमदनी के मोर्चे से भी बेहद निराशाजनक खबरें आ रही हैं। बाजार में अगर यह प्रवृत्ति जारी रही तो केवल बढ़-चढ़ कर किए गए दावों से देश की अर्थव्यवस्था पांच ट्रिलियन के आंकड़े तक नहीं पहुंच सकती!

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