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संपादकीय: बेलगाम लुटेरे

इसमें कोई संदेह नहीं कि लूटपाट, झपटमारी जैसी घटनाएं बढ़ने के पीछे बड़ी वजह युवाओं की बेरोजगारी और पुलिस की निष्क्रियता है।

Author Published on: October 17, 2019 1:57 AM
सवाल है लुटेरों के आगे पुलिस इतनी लाचार क्यों है? (सांकेतिक तस्वीर)

दिल्ली में लूटपाट, झपटमारी की वारदात जिस तेजी से बढ़ रही हैं, उससे लोगों का जीना मुहाल हो गया है। राजधानी का शायद ही कोई इलाका ऐसा होगा जहां लुटेरों का आतंक न हो। सुबह, दोपहर, शाम हो या रात, झपटमार बेखौफ होकर अपने काम में लगे हैं। पिछले तीन-चार महीनों में तो ऐसे अपराधों का ग्राफ तेजी से बढ़ा है। घर के आसपास निकलने में भी लोग घबराने लगे हैं। इस तरह के अपराधों में वृद्धि इस बात का प्रमाण है कि लुटेरों पर दिल्ली पुलिस का कोई बस नहीं रह गया। बढ़ते अपराध कानून-व्यवस्था की रखवाली दिल्ली पुलिस को कठघरे में खड़ा करने के लिए काफी हैं।

तीन हफ्ते के दौरान ही तीन बड़ी वारदातों ने दिल्ली पुलिस के सुरक्षा संबंधी दावों की कलई खोल कर रख दी है। सोमवार रात बाइक सवार लुटेरों ने दिल्ली के कमला नगर इलाके में एक जज का मोबाइल छीन लिया। इसी दिन द्वारका इलाके में एक विमान परिचारिका की चेन छीन ली गई। इससे पहले पिछले महीने की पच्चीस तारीख को साकेत कोर्ट की एक जज का लुटेरों ने तीन किलोमीटर तक पीछा करने के बाद पर्स छीन लिया था और भाग निकले थे। यह घटना सरिता विहार इलाके के पास की थी। लेकिन पुलिस हरकत में तब आई जब हाल में राजनिवास जैसे कड़ी सुरक्षा वाले इलाके में प्रधानमंत्री की भतीजी के साथ लूटपाट की घटना हो गई।

इसमें कोई संदेह नहीं कि लूटपाट, झपटमारी जैसी घटनाएं बढ़ने के पीछे बड़ी वजह युवाओं की बेरोजगारी और पुलिस की निष्क्रियता है। काम-धंधा नहीं मिलने से नौजवान आपराधिक गतिविधियों में जल्द शामिल हो जाते हैं और उन्हें कमाई का यही सबसे आसान जरिया लगता है। फिर, पुलिस की नजर में इस तरह के अपराध शायद कोई बड़े अपराध नहीं, आम बात हैं। पुलिस के इसी रवैये से चोरों- झपटमारों के हौसले बुलंद होते हैं। ज्यादातर मामलों में तो पुलिस लूट, झपटमारी के मामले भी दर्ज नहीं करती।

आम आदमी तो इस तरह की घटनाओं की शिकायत लेकर पुलिस के पास जाने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाता। उसे पता होता है कि इस तरह की शिकायत दर्ज कराने के बाद पुलिस उसे किस कदर परेशान करेगी। जब पुलिस एक जज की लूटपाट की घटना को चोरी में दर्ज करने पर आमादा हो तो सहज ही कल्पना की जा सकती है कि आमजन के साथ क्या होता होगा। पिछले महीने सरिता विहार में जज के साथ लूटपाट की घटना के बाद यही हुआ था। पुलिस ने पहले चोरी की धारा में मामला दर्ज किया, लेकिन जज की आपत्ति के बाद उसे लूटपाट का मामला बनाया गया। इस मामले में पुलिस अभी तक किसी को नहीं पकड़ पाई है।

सवाल है लुटेरों के आगे पुलिस इतनी लाचार क्यों है? कड़ी सुरक्षा वाले इलाकों में जगह-जगह अवरोधक लगे होने और पुलिस गश्त के बावजूद लुटेरे बिना हेलमेट के कैसे सड़कों पर घूमते और वारदात को अंजाम देते रहते हैं? अगर कैमरे न लगे होते तो प्रधानमंत्री की भतीजी को लूटने वाले पकड़ में ही नहीं आ पाते। पुलिस पर लापरवाही के आरोप इसलिए भी लगते हैं कि वीआइपी मामलों को सुलझाने की दर जहां पनचानबे फीसद है, वहीं आम लोगों से जुड़ी वारदात के मामले में यह दर मात्र पचपन फीसद है।

ऐसे अपराधों को अंजाम देने वाले पेशेवर गिरोहों से जुड़े होते हैं, लेकिन जहां तक सजा का सवाल है, पुलिस और न्याय प्रणाली की जटिलता और सबूतों के अभाव में बहुत ही कम अपराधियों को सजा हो पाती है। लेकिन हकीकत यह है कि पुलिस मुस्तैद हो और जिम्मेदारी से काम करे तो इस तरह की वारदात पर अंकुश लग सकता है।

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