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संपादकीय: लेटलतीफी की पटरी

भारतीय रेलवे के इतिहास में यह पहली घटना है जब ट्रेन के लेट होने पर यात्रियों को हर्जाना चुकाया गया है। जाहिर है, इसके लिए ‘सेवा में कमी’ जैसी स्थितियों और इसकी भरपाई के कायदे को आधार बनाया गया होगा।

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देश में ट्रेनों का अपने निर्धारित समय के मुकाबले देरी चलना एक आम बात मानी जाती है और इसे लेकर आम लोग सहज हो चुके हैं। जबकि हर ट्रेन के प्रस्थान और गंतव्य तक पहुंचने के लिए एक समय-सारिणी तय है और उम्मीद की जाती है कि यात्रियों का सफर वक्त पर पूरा हो। मूल्य चुका कर सेवा लेने के सिद्धांत के लिहाज से देखें तो ट्रेनों के मामले में यह नियम भी होना चाहिए कि यात्रियों को समय से उनके गंतव्य तक पहुंचाने का वादा पूरा किया जाए। लेकिन भारत में अब तक ट्रेनों की लेटलतीफी के मामले जगजाहिर रहे हैं। इसके उलट करीब एक पखवाड़े पहले शुरू हुई पहली निजी या कॉरपोरेट ट्रेन तेजस एक्सप्रेस के मामले में जो नियम-कायदे तय किए गए हैं, उसमें इस बात का खयाल रखा गया है कि यह गाड़ी न केवल हर हाल में निर्धारित समय पर अपने गंतव्य पर पहुंचे, बल्कि अगर किन्हीं वजहों से देरी होती है तो उसके एवज में यात्रियों को मुआवजा चुकाया जाएगा। अपने शुरू होने के बाद से यह ट्रेन आमतौर पर समय पर चल रही थी, लेकिन बीते उन्नीस अक्तूबर को यह लखनऊ से चल कर करीब तीन घंटे की देरी से दिल्ली पहुंची। अब इसके लिए तय नियमों के तहत यात्रियों को मुआवजा चुकाया जाएगा।

भारतीय रेलवे के इतिहास में यह पहली घटना है जब ट्रेन के लेट होने पर यात्रियों को हर्जाना चुकाया गया है। जाहिर है, इसके लिए ‘सेवा में कमी’ जैसी स्थितियों और इसकी भरपाई के कायदे को आधार बनाया गया होगा। लेकिन यह तब संभव हो सका है जब किसी ट्रेन को भारतीय रेलवे की एक सहायक कंपनी आइआरसीटीसी के तहत चलाया गया। वरना यह कोई छिपा तथ्य नहीं है कि आज कितनी ट्रेनें समय पर अपने गंतव्य पहुंच पाती हैं और देरी की स्थिति में रेलवे यात्रियों के प्रति कोई अतिरिक्त जिम्मेदारी नहीं उठाता। सवाल है कि बाकी ट्रेनों के मामले में सेवा में कमी का नियम क्यों लागू नहीं होता और इसे कोई गंभीर मामला क्यों नहीं माना जाता। यह विचित्र है कि एक ओर तेजस एक्सप्रेस के देरी से पहुंचने पर यात्रियों को मुआवजा चुकाने का मामला सामने आया, वहीं सूचना के अधिकार कानून के तहत उजागर एक जानकारी के अनुसार चालू वित्त वर्ष के पहले छह महीने के दौरान तमाम रेलगाड़ियों के वक्त पर पहुंचने का औसत लगातार खराब हुआ है। इस मामले में न केवल साधारण यात्री गाड़ियों का, बल्कि राजधानी, शताब्दी, गरीब रथ और सुविधा जैसी सुपरफास्ट श्रेणी की रेलगाड़ियों का प्रदर्शन खराब हुआ है।

ऐसे सवाल अक्सर उठते रहे हैं कि एक ही मार्ग पर एक ट्रेन अपने निर्धारित समय में कैसे पहुंच जाती है और दूसरी गाड़ियां कई-कई घंटे देर क्यों हो जाती हैं! साधारण और एक्सप्रेस श्रेणी की ट्रेनों के मुकाबले राजधानी और शताब्दी जैसी गाड़ियों के देर से पहुंचने की नौबत अपेक्षया कम आती रही हैं। अब यह स्थिति तेजस एक्सप्रेस के मुकाबले शायद बाकी सभी गाड़ियों की बन रही है। लेकिन अगर ताजा घटना को ध्यान में रखें तो इस बात की भी क्या गारंटी है कि भविष्य में तेजस एक्सप्रेस की लेटलतीफी भी आम नहीं हो जाएगी और इसके लिए यात्रियों को मुआवजा चुकाना पड़ेगा। खबरों के मुताबिक सरकार आने वाले वक्त में तेजस एक्सप्रेस की तर्ज पर ही देश की करीब डेढ़ सौ ट्रेनों और पचास रेलवे स्टेशनों को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी में है। सवाल है कि भारतीय रेलवे के मौजूदा तंत्र में ही तेजस एक्सप्रेस या निजी कंपनी की ट्रेनों के समय पर संचालन के लिए व्यवस्थागत कमियों को दूर किया जा सकता है तो दूसरी तमाम ट्रेनों के मामले यह क्यों नहीं हो सकता!

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