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संपादकीय: सफर का तकाजा

सड़क-निर्माण में विशेष लेन की व्यवस्था के साथ-साथ लोगों की आम आदत में जरूरत और उपभोग का संतुलन होना चाहिए।

जाम की वजह से वक्त की बर्बादी और जरूरी काम न हो पाने से लेकर जान के जोखिम जैसी स्थितियां भी पैदा होती हैं। (फोटो- इंडियन एक्सप्रेस)

न सिर्फ दिल्ली और दूसरे महानगरों में, बल्कि देश के लगभग सभी शहरों और कस्बों तक में सड़कों पर जाम एक बड़ी समस्या है। आमतौर पर सभी लोग इससे जूझते हैं, लेकिन शायद ही कभी इस समस्या पर गौर करने की जरूरत समझी जाती है। जाम की वजह से वक्त की बर्बादी और जरूरी काम न हो पाने से लेकर जान के जोखिम जैसी स्थितियां भी पैदा होती हैं। इस समस्या से निपटने के लिए यातायात महकमे की ओर से फौरी तौर पर तो कुछ कदम उठाए जाते हैं, लेकिन कुछ ही वक्त के बाद फिर से वही स्थिति कायम हो जाती है। अब इस मसले पर गठित राज्यसभा की एक विशेष समिति ने अपने अध्ययन के बाद कुछ सिफारिशें की हैं। अगर उन पर अमल होता है तो कम से कम दिल्ली में सड़कों पर कुछ राहत की उम्मीद की जा सकती है। समिति के मुताबिक एक विशेष लेन यानी मार्ग की व्यवस्था की जाए, जो खासतौर पर एंबुलेंस और दमकल जैसे आपात वाहनों के लिए हो। बेतरतीब चलने वाले दुपहिया वाहनों के लिए भी अलग रास्ता होना चाहिए। इसके अलावा, नए वाहन खरीदने की इजाजत तभी मिले, जब पुराने वाहन की समय सीमा खत्म हो जाए और खरीदार के पास पार्किंग की व्यवस्था हो।

यों, एक सुव्यवस्थित शहर में यातायात के लिए अलग से इन सिफारिशों की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। सड़क-निर्माण में विशेष लेन की व्यवस्था के साथ-साथ लोगों की आम आदत में जरूरत और उपभोग का संतुलन होना चाहिए। लेकिन हमारे यहां ऐसे दृश्य आम हैं कि सड़क पर पीछे से एंबुलेंस या दमकल जैसे आपात वाहन आ रहे हों तो उसके आगे चल रहे वाहन किनारे होना जरूरी नहीं समझते, जबकि यह एक सामान्य समझ होनी चाहिए कि एंबुलेंस और दमकल किसी की जान बचाने की कोशिश में जा रहे होते हैं और उनका पहले निकलना बेहद जरूरी है। दुनिया के कई देशों में एंबुलेंस या दमकल के लिए रास्ता खाली करना एक सहज बर्ताव है। मगर हमारे देश में यह अफसोस कायम है। हालांकि इसकी एक वजह यह भी है कि सड़कों पर वाहनों की तादाद इतनी ज्यादा होती है कि कई बार पीछे से आ रहे वाहनों के लिए रास्ता छोड़ना मुमकिन नहीं हो पाता। शायद इसी वजह से राज्यसभा की समिति ने ऐसे वाहनों के लिए विशेष लेन की सिफारिश की है।

एक मुश्किल यह है कि कई लोगों के पास पहले से अपनी जरूरत के वाहन होते हैं, फिर भी वे नई गाड़ी खरीद लेते हैं। यह भी संभव है कि उनके पास वाहन की पार्किंग की जगह न हो। इससे सड़कों पर तो वाहनों की भारी तादाद बड़े जाम की वजह बनती ही है, अक्सर मुहल्लों-कॉलोनियों में सड़कों के दोनों ओर वाहन खड़े कर दिए जाते हैं, जहां पैदल चलना भी मुश्किल होता है। सड़कों पर बहुत कम ऐसे लोग होते हैं, जो वाहन चलाते हुए यातायात के सभी नियम-कायदों का खयाल रखते हैं। जबकि ऐसे तमाम लोग हैं, जो न केवल लापरवाही से वाहन चलाते हैं, बल्कि कई बार नियम तोड़ने में अपनी शान भी समझते हैं। यह सड़क-निर्माण के मामले में बुनियादी ढांचे में खामी के बरक्स ऐसी समस्या है, जिसके रहते सहज और सुरक्षित सफर सुनिश्चित हो पाना लगभग नामुमकिन है। यानी व्यवस्थागत कमियों के समांतर अगर वाहन चालक और बाकी लोग अपनी गड़बड़ियों के बारे में अपने रुख में बदलाव नहीं करेंगे, तब तक सड़कें सहज और सुरक्षित नहीं हो सकेंगी।

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