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संपादकीय: पारदर्शिता का तकाजा

गौरतलब है कि इस तरह के संगठनों या संस्थानों के संदर्भ में आरटीआइ कानून के लागू होने के दायरे को लेकर लंबे समय से धुंध-सी बनी हुई थी।

Author Published on: September 19, 2019 3:51 AM
सांकेतिक तस्वीर।

करीब चौदह साल पहले जब सूचना का अधिकार कानून लागू हुआ था, तब इसका मकसद यही था कि सरकार और उसकी मदद से चलने वाले संस्थानों के कामकाज में पारदर्शिता लाई जाए, ताकि जनता का हित सुनिश्चित हो सके। शुरुआती दिनों से ही इस कानून ने समूचे सरकारी तंत्र की कार्यशैली पर खासा असर डाला और आम लोग भी किसी कार्यालय से वैसी सूचनाएं प्राप्त करने लगे, जिनके बारे में जानकारी के अभाव में उनके जरूरी काम रुके रहते थे। इस कानून ने आम नागरिकों को बेहद सशक्त बनाया और सरकारी महकमों के काम में पारदर्शिता लाने का यह एक कारगर हथियार बना। इसके असर का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि कई संस्थान इस कानून को अपनी सुविधा में एक बड़ी बाधा मानने लगे थे। खासतौर से देश में काम करने वाले गैर-सरकारी संगठन खुद को इसके दायरे से मुक्त रखना चाहते थे, जबकि उनके कामकाज में सरकारी अनुदानों की एक बड़ी भूमिका होती है और आखिर उन्हें जनता के हित में काम करने का हवाला देकर ही अपनी गतिविधि संचालित करनी होती है। हालांकि गैर-सरकारी संगठनों को भी सूचनाधिकार कानून के दायरे में लाने की मांग लंबे समय से की जा रही थी।

अब सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को यह साफ कर दिया कि सरकार से मोटी राशि पाने वाले गैरसरकारी संगठन सूचना का अधिकार कानून के तहत लोगों को सूचना मुहैया कराने के लिए बाध्य हैं। इसके अलावा, अदालत के मुताबिक, प्रत्यक्ष या रियायती दर पर जमीन के रूप में अप्रत्यक्ष रूप से पर्याप्त सहायता पाने वाले स्कूल-कॉलेज और अस्पताल जैसे संस्थानों को भी आरटीआइ कानून के तहत नागरिकों को सूचना उपलब्ध करानी होगी।

गौरतलब है कि इस तरह के संगठनों या संस्थानों के संदर्भ में आरटीआइ कानून के लागू होने के दायरे को लेकर लंबे समय से धुंध-सी बनी हुई थी। देश भर में ऐसे गैर सरकारी संगठनों की संख्या काफी बड़ी है जिन्हें सरकारी महकमों से अनुदान लेने में कोई हिचक नहीं होती, लेकिन उसके ब्योरे में पारदर्शिता बरतना उन्हें जरूरी नहीं लगता। बल्कि इस कानून से मुक्त होने की उम्मीद में ही शैक्षणिक संस्थानों को संचालित करने वाले कुछ एनजीओ, कई स्कूल-कॉलेज और संगठनों ने शीर्ष अदालत में दावा किया था कि एनजीओ आरटीआइ कानून के दायरे में नहीं आते हैं। हालांकि सूचना का अधिकार कानून में यह प्रावधान मौजूद है कि सरकार से सहायता लेने वाले एनजीओ और अन्य संस्थानों को अपनी आय से संबंधित सारी जानकारी अपनी वेबसाइटों पर सार्वजनिक करनी होगी।

लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद यह साफ हो जाना चाहिए कि अगर कोई एनजीओ सरकार से भारी पैमाने पर अनुदान लेता है या स्कूल-अस्पताल जैसे संस्थानों का संचालन करता है तो आम लोगों को उसके समूचे तंत्र के स्वरूप, खर्च से लेकर संचालन या नियमावली आदि के बारे में जानने का हक है। यों भी, देश में गैरसरकारी संगठनों का जिस कदर विस्तार हो चुका है और उनके लिए सरकारी अनुदान जारी किए जाते हैं, उसके ढांचे और कामकाज में पारदर्शिता की मांग एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। देश में ऐसे तमाम एनजीओ हैं, जिनके संचालकों के तार सरकारी महकमों में ऊंचे स्तर पर जुड़े होते हैं।

ये संगठन भारी पैमाने पर सरकारी अनुदानों का लाभ उठाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उसका लाभ अपेक्षित स्तर पर लोगों को नहीं मिल पाता है! इसलिए अगर कोई नागरिक या समूह इस कानून का सहारा लेकर किसी एनजीओ की गतिविधि या खर्च आदि का ब्योरा जानना चाहता है तो यह पारदर्शिता का तकाजा है और इससे संबंधित संगठन की विश्वसनीयता में ही इजाफा होगा।

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