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संपादकीय: पारदर्शिता का तकाजा

हालांकि सन 2010 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस मामले में साफतौर पर कहा था कि प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय सूचना के अधिकार कानून के दायरे में आता है।

Author Published on: November 14, 2019 2:14 AM
अदालत ने यही कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय एक ‘पब्लिक अथॉरिटी’ यानी सार्वजनिक उपक्रम है।

कानून से ऊपर कोई नहीं है। यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे मामले पर फैसला देते हुए की जिसमें उसके प्रमुख न्यायाधीश के कार्यालय को भी आरटीआइ यानी सूचना के अधिकार कानून के दायरे में लाने की मांग की गई थी। हालांकि यह एक आम व्यवस्था है कि संविधान और कानून की कसौटी पर देश के सभी नागरिक और समूची व्यवस्था को संचालित करने वाला हरेक व्यक्ति बराबर है, भले ही वह कितने भी ऊंचे पद पर या विशिष्ट क्यों न हो, मगर यह भी सच है कि कुछ मामलों में महज धारणा और स्थापित परंपराओं की वजह से किसी व्यक्ति या पद को लेकर रियायत का रुख अपनाया जाता है।

सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के कार्यालय को आरटीआइ कानून के दायरे में लाया जाए या नहीं, इसी धारणा की वजह से पिछले कई सालों से ऊहापोह या विचार का विषय बना हुआ था। लेकिन बुधवार को सुप्रीम कोर्ट के पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने यह साफ कर दिया कि शीर्ष अदालत के प्रमुख न्यायाधीश का कार्यालय अब सूचनाधिकार कानून के दायरे में आएगा। इससे न सिर्फ जवाबदेही और पारदर्शिता में इजाफा होगा, बल्कि न्यायिक स्वायत्तता भी मजबूत होगी।

गौरतलब है कि जब आरटीआइ कानून लागू हुआ था, तभी उसमें यह स्पष्ट व्यवस्था थी कि ‘कुछ अपवादों को छोड़ कर’ यह सब पर लागू होता है। यानी कुछ खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित संवेदनशील जानकारियों के अलावा अमूमन सभी मामलों में इस कानून के तहत सूचना देनी ही पड़ेगी। लेकिन न्यायपालिका के मामले में कोई स्पष्ट स्थिति सामने नहीं आ पा रही थी।

हालांकि सन 2010 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस मामले में साफतौर पर कहा था कि प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय सूचना के अधिकार कानून के दायरे में आता है और न्यायिक स्वतंत्रता किसी न्यायाधीश का विशेषाधिकार नहीं है, बल्कि उन्हें इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई है। अब अपने ताजा फैसले में अदालत ने यही कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय एक ‘पब्लिक अथॉरिटी’ यानी सार्वजनिक उपक्रम है। इसके सभी न्यायाधीश भी आरटीआइ के दायरे में आएंगे।

इसके बावजूद इसमें पहले से जारी गोपनीयता बरकरार रहेगी। दरअसल, आरटीआइ की अहमियत जगजाहिर रही है और बीते कई सालों से लगातार इसके जरिए शासन तंत्र में पारदर्शिता कायम करने से लेकर गोपनीयता के नाम पर छिपाई गई कई जानकारियां सामने आती रही हैं। लेकिन ऐसे भी कुछ मामले सामने आए जब सूचना और निजता के सिद्धांत के बीच टकराव की स्थिति बनती दिखी।

पिछले कुछ सालों के दौरान ऐसे सवाल भी उठे कि कुछ मामलों में आरटीआइ को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। शायद इसी के मद्देनजर अदालत ने आगाह किया कि न्यायपालिका के मामले में अगर आरटीआइ के जरिए जानकारी मांगी जाती है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन इसका इस्तेमाल निगरानी रखने के हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता और पारदर्शिता के मसले पर विचार करते समय न्यायिक स्वतंत्रता को ध्यान में रखना होगा। न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदोन्नति और स्थानांतरण के मामले में प्रक्रिया संबंधी सूचना देने के सवाल को बहस का विषय माना गया था।

लेकिन निजता के दायरे को अगर छोड़ दिया जाए तो न्यायाधीशों के तबादले और पदोन्नति की प्रक्रिया में पारदर्शिता की अपेक्षा की गई थी। शायद यही वजह है कि अदालत ने पारदर्शिता के समांतर निजता के अधिकार को भी एक अहम चीज माना और प्रधान न्यायाधीश के कार्यालय से सूचना देते वक्त उसके संतुलित होने की अपेक्षा पर जोर दिया। अब यह माना जा रहा है कि इस बेहद अहम मसले पर छाई धुंध साफ हो सकेगी।

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