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संपादकीय: खतरे में गंगा

गंगा के निर्मलीकरण की महत्त्वाकांक्षी योजनाएं अब तक थोथी ही साबित हुई हैं। लिहाजा, गंगा-यमुना के प्रदूषण से जुड़ी खबरें अब झकझोरती नहीं हैं। अब तक यह माना जाता था कि गंगा मैदानी इलाकों में कहीं ज्यादा प्रदूषित है। लेकिन ताजा सर्वे ने तय किया है कि गंगा कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी जैसे नगरों से कहीं ज्यादा ऋषिकेश और हरिद्वार में दूषित हो चुकी है।

Author Published on: September 20, 2019 1:39 AM
गंगा।

जीवनदायी गंगा नदी में उसके उद्गम स्थल गंगोत्री से गंगासागर तक जीवाणुओं की खोज होगी, जिससे प्रदूषणकारी तत्त्वों, नदी के स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी पर इन जीवाणुओं के प्रभाव का पता चल सके। गंगा का पानी मानव स्वास्थ्य से भी जुड़ा है, इसलिए इसकी सूक्ष्म जीवाणु संबंधी विविधता को समझने के लिए जीआइएस मैपिंग की जा रही है। नौ करोड़ से ज्यादा की लागत वाला यह अध्ययन राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के अंतर्गत चौबीस महीने में पूरा किया जाना है। इस अध्ययन के प्रस्ताव में कहा गया है कि गंगा नदी के कई क्षेत्रों में जीवाणुओं के संबंध में टुकड़ों में तो कई अध्ययन किए गए हैं, लेकिन पूरी नदी में जीवाणुओं का कोई अध्ययन अब तक नहीं हुआ है। इस अध्ययन में नदी के स्वास्थ्य और पुनर्जीवन क्षमता को परिभाषित करने और मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव का भी आकलन किया जाएगा, ताकि नदी-जल की गुणवत्ता के मापदंड दोबारा परिभाषित किए जा सकें।

यह पड़ताल ऐसे समय की जा रही है जब नदी में जैव विविधता की कमी संबंधी रिपोर्ट सामने आई है। इसमें एक अहम आयाम नदी जल में मौजूद बैक्टीरियोफेज नामक जीवाणु की उपस्थिति हो सकती है, जो गंदगी और बीमारी फैलाने वाले जीवाणुओं को नष्ट कर देते हैं। गंगा में वनस्पति और जंतुओं की दो हजार से ज्यादा प्रजातियां उपलब्ध हैं। इनमें से कई प्रजातियां क्षेत्र विशेष में पाई जाती हैं। गंगा डॉल्फिन, घड़ियाल और मुलायम कवच वाले कछुए इसके विशिष्ट उदाहरण हैं। पाली कीट, सीप और घोंघों की कई प्रजातियां समुद्र और गंगा दोनों में पाई जाती हैं।

गंगा में जीवाणुओं की तलाश और उनकी उपलब्धि नई बात नहीं है। ‘सुपरबग’ नाम का जीवाणु गंगा में पहले ही खोज लिया गया है। इसे मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बताया गया है। जैव प्रतिरोधी जीन सुपरबग एक प्रकार का जीवाणु है जो कई बीमारियों के जन्म का कारक है। सुपरबग ने गंगा किनारे बसे शहरों और कस्बों को अपनी चपेट में भी ले लिया है। पवित्र गंगा में पुण्य लाभ के लिए जब तीर्थयात्री डुबकी लगाते हैं, तब सुपरबग सीधे मनुष्य के फेफड़ों पर हमला बोलता है और श्वसन-तंत्र को कमजोर बनाने का सिलसिला शुरू कर देता है। यह महाजीवाणु इसलिए ज्यादा खतरनाक है कि यह दो जीन के संयोग से बना है। हालांकि जैव प्रतिरोधी के खिलाफ प्रतिरोधी क्षमता विकसित कर लेने वाले सुपरबग के अस्तित्व को लेकर भ्रम की स्थिति है। लेकिन हाल में ब्रिटेन के न्यूकैसल विश्वविद्यालय और आरआइटी-दिल्ली के वैज्ञानिकों ने गंगा जल पर जो ताजा शोध किए हैं, उनमें दिए ब्योरे गंगा में सुपरबग की उपस्थिति का विश्वसनीय दावा करने वाले हैं। तय है, गंगा को कचरे के नाले में बदलने वाले उपाय आखिर इसे कब तक निर्मल बनाए रख पाएंगे?

गंगा के निर्मलीकरण की महत्त्वाकांक्षी योजनाएं अब तक थोथी ही साबित हुई हैं। लिहाजा, गंगा-यमुना के प्रदूषण से जुड़ी खबरें अब झकझोरती नहीं हैं। अब तक यह माना जाता था कि गंगा मैदानी इलाकों में कहीं ज्यादा प्रदूषित है। लेकिन ताजा सर्वे ने तय किया है कि गंगा कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी जैसे नगरों से कहीं ज्यादा ऋषिकेश और हरिद्वार में दूषित हो चुकी है। मसलन, गंगा इसके उद्गम स्थल गोमुख से लेकर समापन स्थल गंगासागर तक लगभग सभी जगह मैली हो चुकी है। यही मैल महाजीवाणु की उत्पत्ति और उसकी वंश वृद्धि के लिए सुविधाजनक आवास सिद्ध हो रहा है। वैज्ञानिकों ने इसे ताजा उत्पत्ति माना है और दिल्ली के पानी में इसकी मौजूदगी पाए जाने से इसका नाम नई दिल्ली मेटालाबीटा लैक्टोमस-1 (एनडीएम-1) रखा है। यह भी माना गया है कि जैव प्रतिरोधी के अत्यधिक उपयोग से यह पैदा हुआ है। गंगा में मिले सुपरबग की अलग पहचान बनाए रखने की दृष्टि से इसे बीएलएएनडीएम-1 का नाम दिया गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह भविष्य में कायांतरण करके अन्य किसी नए अवतार में भी सामने आ सकता है। इस पर नियंत्रण का एक ही तरीका है कि गंगा में गंदे नालों के बहने और कचरा डालने पर सख्ती से रोक लगाई जाए।

सुपरबग के वजूद को लेकर भारत में भ्रम की स्थिति रही है। जब दिल्ली में पहली बार वैज्ञानिकों ने इसकी मौजूदगी जताई थी, तब दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने इस हकीकत को नकारते हुए दावा किया था कि दिल्ली का पानी शुद्ध और स्वच्छ है और ऐसा महज दिल्ली में दहशत फैलाने के मकसद से किया जा रहा है। तब अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने भारत को चेताया था कि प्रतिरोधात्मक क्षमता का असर कम करने वाले जीन जरूर भारत में पहले से मौजूद रहे हों, लेकिन जो जीवाणु दो जीन के मेल से बना है, वह पहली बार ही देखने में आया है। हालांकि इस जानकारी के आने से पहले भारत में सुपरबग की खोज हो चुकी थी। मार्च 2010 में पहली बार एसोसिएशन आॅफ फिजीशियन आॅफ इंडिया के जर्नल में सुपरबग के वजूद का विस्तृत ब्योरा पेश किया था। इस अध्ययन में बताया गया था कि एनडीएम-1 ऐसा महाजीवाणु है जो अंधाधुंध एंटीबायोटिक के इस्तेमाल के कारण सूक्ष्म जीवों में जबरदस्त प्रतिरोधात्मक क्षमता विकसित कर रहा है।

सुपरबग का भारत या गंगा नदी में पाया जाना कोई अपवाद नहीं है। ये सूक्ष्म जीव दुनिया में कहीं भी मिल सकते हैं। किसी नगर, देश या क्षेत्र विशेष में ही इनके पनपने के कोई तार्किक प्रमाण नहीं हैं। लेकिन गंगा में इन सूक्ष्म जीवों का पाया जाना इसलिए हैरत में डालने वाली घटना है क्योंकि गंगा दुनिया की नदियों में सबसे शुद्धतम जल वाली नदी है और करोड़ों लोग गंगाजल का सेवन करके अपने जीवन को धन्य मानते हैं।

गोमुख से गंगासागर तक गंगा पांच राज्यों से होकर बहती है। इसके किनारे उनतीस शहर दस लाख से ज्यादा आबादी वाले बसे हैं। तेईस शहर ऐसे हैं जिनकी आबादी पचास हजार से एक लाख के बीच है। कानपुर के आसपास मौजूद साढ़े तीन सौ चमड़ा शोधन इकाइयां हैं जो इसे सबसे ज्यादा दूषित करती हैं। बीस फीसद औद्योगिक नाले और अस्सी फीसद मल विसर्जन से जुड़े परनालों के मुंह इसी गंगा में खुले हैं। मसलन, आठ करोड़ लीटर मल-मूत्र और कचरा रोजाना गंगा में बहाया जा रहा है। यही कारण है कि गंगा का जीवनदायी जल जीवन के लिए खतरा बन रहा है। इसीलिए गंगा की गिनती आज दुनिया की सबसे प्रदूषित नदियों में हो रही है। इससे स्पष्ट है कि गंगा जल परीक्षण के नमूने किसी भी शहर से लिए जाएं, उसके नतीजे भयावह ही आ रहे हैं।

गंगा नदी हमारे देश में न केवल पेयजल और सिंचाई आदि की जरूरत की पूर्ति का बड़ा जरिया है, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था भी इससे जुड़ी है। फिर भी यह लगातार प्रदूषित होती गई तो सिर्फ इसलिए कि हमने विकास के नाम पर इस बात की परवाह नहीं की कि हमारे प्राकृतिक संसाधनों का क्या हश्र होने वाला है। यहां तक कि हिमालय पर गोमुख से उत्तरकाशी तक एक सौ तीस किलोमीटर के दायरे में पनबिजली परियोजनाएं शुरू करके इसके उद्गम स्थल को ही दूषित कर दिया। जाहिर है, प्रकृति के तरल स्नेह का संसाधन के रूप में दोहन करना गलत है। उपभोग की इस वृत्ति पर अंकुश लगना चाहिए। एक नदी की सांस्कृतिक विरासत में वन, पर्वत, पशु-पक्षी और मानव समुदाय शामिल हैं। इसलिए कचरा बहा कर नदी के निर्मल स्वास्थ्य को खराब किया जाएगा तो उसमें महाजीवाणुओं के पनपने की आशंकाएं बढ़ेंगी ही। लिहाजा, गंगा जल में मौजूद जीवाणुओं की खोज और पहचान करके जो मानचित्र सामने आएगा, उससे गंगा सफाई अभियान को कोई गति मिलने वाली नहीं है।

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