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संपादकीय: कसता शिकंजा

हाफिज सईद और आतंकवाद के संबंध में शायद ही कोई तथ्य छिपा रहा है।

हाफिज सईद और आतंकवाद के संबंध में शायद ही कोई तथ्य छिपा रहा है।

पाकिस्तान में बुधवार को आखिरकार हाफिज सईद के खिलाफ आतंकवाद के वित्त-पोषण के आरोप तय हो गए। लेकिन इससे पहले वहां की सत्ता के रुख में जिस तरह का ऊहापोह और उतार-चढ़ाव देखा गया था, उससे साफ था कि अनेक सबूत होने के बावजूद हाफिज सईद को गंभीर आरोपों के तहत कठघरे में खड़ा करने में सरकार को हिचक हो रही है। अब पाकिस्तान की आतंकवाद विरोधी अदालत में जब उसके खिलाफ आरोप तय हुए हैं तब भी संभावना यही है कि इसके पीछे वहां की सरकार की इच्छाशक्ति नहीं रही होगी, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय दबाव का नतीजा होगा। गौरतलब है कि पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के उप-अभियोजनक जनरल अब्दुर्रऊफ ने आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने की दलील देते हुए कहा कि हाफिज सईद और तीन अन्य लोग आतंकवाद के वित्त-पोषण में शामिल हैं। पंजाब आतंकवाद विरोधी विभाग ने इससे संबंधित ठोस सबूत भी पेश किए। हालांकि बीते शनिवार को इसी अदालत में जिस तरह के हालात पैदा हुए थे, उससे यह आशंका खड़ी हो गई थी कि शायद एक बार फिर हाफिज को बख्श देने की भूमिका बनाई जा रही है, क्योंकि संबंधित अधिकारी इस हाई-प्रोफाइल मामले की सुनवाई में भी एक सह-आरोपी को पेश करने में नाकाम रहे थे।

गौरतलब है कि जब भारत की ओर से लगातार कूटनीतिक कवायदों के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने दबाव बनाया, तब पाकिस्तान के अधिकारियों ने लश्कर-ए-तैयबा, जमात-उद-दावा और उसकी सहयोगी शाखा फलाह-ए-इंसानियत फाउंडेशन के खिलाफ जांच शुरू की थी। हालांकि इन आरोपों की लगभग पुष्टि पहले ही हो चुकी थी, लेकिन उस जांच में भी आतंकवादी कार्रवाइयों को अंजाम देने के लिए धन जुटाने के लिए इन ट्रस्टों का इस्तेमाल किए जाने के तथ्य उजागर हुए। लेकिन यह समझना मुश्किल है कि सबूतों और तथ्यों के बावजूद पाकिस्तान की ओर से हाफिज सईद और उसके संगठनों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर इतनी शिथिलता क्यों बरती गई। अब कोई चारा नहीं होने पर तीन आतंकियों सहित हाफिज सईद पर आतंक के वित्तपोषण के आरोप तय हुए हैं। यों पाकिस्तान का अब तक का जो रुख रहा है, उसमें अब वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने यही प्रचारित करने की कोशिश करेगा कि हाफिज सईद के खिलाफ कसा गया ताजा शिकंजा सरकार की आतंकवाद विरोधी नीतियों का हिस्सा है। लेकिन अगर पाकिस्तान आतंकवाद पर लगाम लगाने के प्रति इतना ही ईमानदार है, तो हाफिज के मसले पर इस फैसले तक पहुंचने में इतना ज्यादा वक्त क्यों लगा!

हाफिज सईद और आतंकवाद के संबंध में शायद ही कोई तथ्य छिपा रहा है। खासतौर पर मुंबई पर आतंकी हमले के मामले में ये आरोप लंबे समय से तथ्यगत रूप से सामने थे कि उस घटना सहित दूसरी आतंकी गतिविधियों में लिप्त लोगों को हाफिज सईद के संगठनों ने धन मुहैया कराए थे और मुख्य साजिशकर्ता भी वही था। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जिस हमले में एक सौ छियासठ लोग मारे गए थे, उसके जिम्मेदार आरोपियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने के प्रति पाकिस्तान ने कभी ईमानदारी से कोई ठोस पहलकदमी नहीं की। जबकि भारत की ओर से जुटाए गए सबूत इस बात की साफ गवाही थे कि वह हमला पाकिस्तान स्थित ठिकानों से संचालित किया गया था। लेकिन पाकिस्तान ने हमेशा इस बात से इनकार किया था कि उसकी सीमा में आतंकी गतिविधियों को पनाह दी जाती है। लेकिन बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच इस मुद्दे पर पाकिस्तान को रक्षात्मक होना पड़ा है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि न केवल भारत के हितों के मद्देनजर, बल्कि खुद पाकिस्तान को अपनी सीमा में भी शांति और सहजता के लिए आतंकवाद के खिलाफ सख्त रवैया अख्तियार करने की जरूरत है।

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