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संपादकीय: आतंक की चुनौती

बुधवार को एक बार फिर जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग में आतंकी हमला हुआ। इससे साफ है कि समस्या के ठोस समाधान की स्थिति पैदा होने से पहले ही आतंकी गिरोह उसे बाधित कर देते हैं।

Author June 14, 2019 1:06 AM
अनंतनाग में सुरक्षा बलों पर आतंकी हमला फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

जब भी इस बात के संकेत मिलने लगते हैं कि अब आतंक से त्रस्त कश्मीर में शांति की कोशिशें सकारात्मक रास्ते की ओर जा सकती हैं, तभी आतंकी संगठनों की ओर से कुछ न कुछ ऐसा कर दिया जाता है, जो समूची कवायदों को भटका देता है। बुधवार को एक बार फिर जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग में आतंकी हमला हुआ। इससे साफ है कि समस्या के ठोस समाधान की स्थिति पैदा होने से पहले ही आतंकी गिरोह उसे बाधित कर देते हैं। हालांकि जम्मू-कश्मीर पुलिस ने पहले ही आम लोगों की आवाजाही वाली जगहों, खासकर बस स्टैंड पर हमले की चेतावनी साझा की थी। इसके बावजूद अनंतनाग के केपी रोड पर मौजूद एक व्यस्त बस स्टैंड पर आतंकियों ने दिनदहाड़े हमला किया और उन्हें रोकने की पूर्व तैयारी नहीं थी। इस हमले में सीआरपीएफ के पांच जवान शहीद हो गए और तीन अन्य जवान घायल हो गए। हमला होने के बाद जब सुरक्षा बलों ने जवाबी कार्रवाई शुरू की, तो एक आतंकी भी मारा गया।

इस हमले की जिम्मेदारी एक आतंकी गुट अल-उमर मुजाहिदीन ने ली है, जिसे पिछले काफी समय से निष्क्रिय माना जा रहा था। लेकिन जम्मू-कश्मीर में आतंकी गतिविधियों पर नजर रखने वाले अधिकारियों ने इस हमले के पीछे जैश-ए-मोहम्मद का हाथ होने की आशंका जताई है। छिपी बात नहीं है कि घाटी में आतंकवादी संगठनों का एक बड़ा नेटवर्क काम करता है और अलग-अलग चेहरों के साथ हमलों को अंजाम देने और भ्रम पैदा कर सुरक्षा बलों का ध्यान भटकाने की कोशिश करता है। पिछले कुछ समय से जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा को केंद्र में रख कर राज्य में आतंकवाद के खिलाफ अभियान चलाए जा रहे हैं। लेकिन अगर पिछले कुछ समय से निष्क्रिय पड़ा कोई संगठन यह दावा करता है, तो उसे भी नजरअंदाज करने की जरूरत नहीं है, भले उसका मकसद महज चर्चा में आना हो। हालांकि राज्य की प्रतिकूल परिस्थितियों में काम करने वाले सुरक्षा बल वहां की जटिलता को ज्यादा बेहतर समझते हैं और उसी के मुताबिक काम करते हैं। मगर जब खुफिया सूचना के बावजूद आतंकी हमले में हमारे पांच जवानों की जान चली जाती है, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि सावधानी में चूक कहां हुई!

अक्सर देखा गया है कि जब भी हालात सामान्य होने लगते हैं, तो आतंकी हमले के जरिए एक खास तरह का संदेश देने की कोशिश की जाती है। जाहिर है, वे हमेशा आतंक और अराजकता के हालात बनाए रखना चाहते हैं, ताकि स्थानीय जनता के बीच उन्हें लेकर एक भ्रम बना रहे। इसके पीछे सीमा पार से आतंकवादी संगठनों को मिल रही शह से इनकार नहीं किया जा सकता। खासकर पाकिस्तान स्थित ठिकानों से आतंकी गतिविधियां संचालित करने वाले संगठनों पर लगाम लगाने का सवाल कई बार उठा है। लेकिन इस दिशा में अब तक पाकिस्तान ने ठोस कदम नहीं उठाए। यों कहने को वह अक्सर कहता है कि अपनी सीमा से आतंकी गतिविधियां चलाने की इजाजत नहीं देगा, लेकिन हकीकत किसी से छिपी नहीं है। पुलवामा हमले में बयालीस जवानों की शहादत के बाद माना जा रहा था कि सुरक्षा-व्यवस्था से लेकर खुफिया-तंत्र को इतना मजबूत और सक्रिय किया जाएगा कि वैसी घटना दोबारा न हो। पर ताजा हमले से एक बार फिर यही जाहिर हुआ है कि राज्य में फिलहाल आतंकवादियों को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए।

 

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