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संपादकीय: तालिबान की हिंसा

हाल में अमेरिका और तालिबान के बीच शांति वार्ता टूटने के बाद तो हालात बेकाबू हो गए हैं।

Author Published on: September 21, 2019 1:55 AM
सांकेतिक तस्वीर।

अफगानिस्तान में राष्ट्रपति चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, तालिबान की हिंसा का ग्राफ भी उतनी ही रफ्तार से बढ़ रहा है। पिछले कई दिनों से शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरा हो जब आत्मघाती हमलों से अफगानिस्तान के शहर दहल नहीं रहे हों। अस्पताल, सरकारी इमारतें, पुलिस और सुरक्षा बलों के ठिकाने, यहां तक कि अमेरिकी दूतावास तक पर तालिबान के हमले यह संदेश दे रहे हैं कि इस देश की सत्ता पर फिर से कब्जे के लिए वह पूरी ताकत के साथ लड़ेगा। दूसरी ओर तालिबान को सबक सिखाने के लिए अमेरिकी सेना के हमले भी जारी हैं। दो दिन पहले एक अमेरिकी ड्रोन के हमले में बीस से ज्यादा बेगुनाह मारे गए। अमेरिका और तालिबान को इस बात से तनिक चिंता नहीं है कि इन दोनों के झगड़े में निर्दोष अफगान जनता बुरी तरह पिस रही है।

हाल में अमेरिका और तालिबान के बीच शांति वार्ता टूटने के बाद तो हालात बेकाबू हो गए हैं। तालिबान ने और ज्यादा उग्र रूप धारण कर लिया है। ऐसे में सवाल है कि इस हिंसा के बीच अगले हफ्ते राष्ट्रपति चुनाव कैसे होंगे। अफगानिस्तान के हालात पर चिंता जाहिर करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने कहा है कि सभी अफगान नागरिकों को ‘भय और हिंसा मुक्त’ जीवन जीने का अधिकार है। लेकिन यह कैसे सुनिश्चित हो, इसके उपाय इस वैश्विक निकाय के पास भी नहीं हैं।

अफगानिस्तान में इस वक्त हिंसा का जो दौर चल रहा है उसने पूरे देश को फिर उसी स्थिति में ला खड़ा किया है जो दो दशक पहले बनी हुई थी। इन हालात के लिए क्या तालिबान दोषी है या फिर अमेरिका या अफगानिस्तान की मौजूदासरकार, यह सवाल फिलहाल दब-सा गया है। अगर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप शांति वार्ता तोड़ने जैसा कठोर कदम नहीं उठाते तो शायद आज हालात इतने नहीं बिगड़ते। लेकिन एक अमेरिकी सैनिक की मौत के मामले पर अमेरिका ने पूरे अफगानिस्तान को हिंसा की आग में झोंक डाला।

हालांकि पिछले साल अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने तालिबान को एक राजनीतिक पार्टी की मान्यता देते हुए जेल में बंद उसके लड़ाकों को रिहा करने का बड़ा फैसला लिया था। तालिबान के साथ शांति वार्ता की दिशा में यह बड़ा कदम था। इस बीच कतर में शांति वार्ता के दौर तो चलते रहे लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला था। बाद में मास्को में हुई शांति वार्ता में अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई भी शामिल हुए, लेकिन तब इसमें अफगान सरकार को शामिल नहीं किया गया। तालिबान की शर्त थी कि चुनाव रद्द होने पर ही वह अमेरिका के साथ समझौता करेगा। इस तरह वार्ता राजनीति और अहम की लड़ाई में उलझती रही। तालिबान का अड़ियल रवैया भी इसका एक बड़ा कारण रहा, जिसकी कीमत आज अफगानिस्तान युद्ध के मैदान के रूप में चुका रहा है।

इस वक्त सबसे बड़ी प्राथमिकता अफगान नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होनी चाहिए। यह काम अफगानिस्तान की सरकार, तालिबान और अमेरिका को ही करना है। इसके लिए जरूरी है कि तीनों अपना हठ छोड़ें और खासतौर से अमेरिका अफगानिस्तान में अपने हितों को छोड़े। शांति वार्ता रद्द होने से अफगानिस्तान की सरकार खुश है। दूसरी ओर तालिबान अब अमेरिका को सबक सिखाने पर तुला है। इसीलिए उसने शांति वार्ता टूटने के बाद और ज्यादा अमेरिकियों पर हमले की धमकी दी है। जाहिर है, आने वाले दिन अफगानिस्तान के लिए और संकट भरे होंगे।

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