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संपादकीय: स्त्री का हक

दरअसल, आजादी के सत्तर साल बाद भी अगर देश की आधी आबादी के लिए सार्वजनिक जीवन में पर्याप्त भागीदारी सुनिश्चित नहीं की जा सकी है तो यह हमारी नीतिगत नाकामी और सामाजिक विकास के अधूरेपन का ही आईना है।

Author March 14, 2019 2:33 AM
केंद्रीय मंत्री सुषमा स्वराज व अन्य महिला नेता

भावी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर पिछले तीन दिनों के भीतर देश के दो राज्यों में सत्ताधारी पार्टियों ने उम्मीदवारी में महिलाओं की भागीदारी को लेकर जो घोषणा की है, वह देर से की गई एक स्वागतयोग्य पहल है। मंगलवार को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के बयालीस लोकसभा उम्मीदवारों की घोषणा की, जिनमें सत्रह महिलाएं हैं। हिस्सेदारी की कसौटी पर यह करीब इकतालीस फीसद है। इससे दो दिन पहले ओड़ीशा के मुख्यमंत्री ने बीजू जनता दल से लोकसभा चुनावों में तैंतीस फीसद उम्मीदवारी महिलाओं को देने की घोषणा की थी। हालांकि पिछले साल नवंबर में ही ओड़ीशा विधानसभा ने महिलाओं के लिए तैंतीस फीसद आरक्षण को लेकर सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया था। जाहिर है, संसद और राज्यों के विधानमंडलों में महिलाओं को तैंतीस फीसद आरक्षण देने से संबंधित विधेयक करीब दो दशक बाद भले ही अपने अंजाम तक नहीं पहुंच सका है, लेकिन बिना कानूनी व्यवस्था के ही कुछ पार्टियों ने महिलाओं के लिए वाजिब भागीदारी सुनिश्चित करने की शुरुआत कर दी है।

दरअसल, आजादी के सत्तर साल बाद भी अगर देश की आधी आबादी के लिए सार्वजनिक जीवन में पर्याप्त भागीदारी सुनिश्चित नहीं की जा सकी है तो यह हमारी नीतिगत नाकामी और सामाजिक विकास के अधूरेपन का ही आईना है। यह लोकतंत्र का तकाजा है कि संसद में देश का चेहरा दिखे, समाज के अलग-अलग तबकों को वाजिब नुमाइंदगी मिले, ताकि सभी लोग व्यवस्था में भरोसा कर सकें। लेकिन यह हैरानी की बात है कि एक लोकतांत्रिक प्रणाली के बावजूद हमारे राजनीतिक दलों ने इस दिशा में कुछ भी नहीं किया। अंतर-संसदीय यूनियन के एक अध्ययन के मुताबिक दुनिया भर की संसदों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में भारत अभी भी नेपाल, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों के मुकाबले काफी पीछे है। फिलहाल भारतीय संसद के दोनों सदनों में महज करीब बारह प्रतिशत महिलाएं हैं। महिलाओं की वाजिब भागीदारी के सवाल को अगर देश के सभी दलों ने अपने राजनीतिक स्वभाव में शामिल किया होता तो आज हमारी संसद इस मसले पर कठघरे में खड़ी नहीं होती।

किसी भी सभ्य समाज और परिपक्व लोकतंत्र में हाशिये पर छोड़ दिए गए समूहों को सत्ता और तंत्र के सभी स्तरों पर पर्याप्त भागीदारी देने की पहलकदमी अपेक्षया ज्यादा समर्थ और हर जगह मौजूद तबकों को अपनी ओर से करनी चाहिए। लेकिन हमारे यहां हालत यह है कि महिलाओं के इस अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए उन्हें तैंतीस फीसद आरक्षण देने की व्यवस्था के मद्देनजर जो कानून बनाने की कोशिश की गई, वह भी दो दशक से ज्यादा समय से अधर में लटकी है। जब यह विधेयक पेश हुआ था, तब मांग की गई थी कि इस व्यवस्था के तहत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए भी उचित आरक्षण का प्रावधान हो। इसी विवाद के बाद तब वह विधेयक पारित नहीं हो सका था। 2010 में एक कोशिश हुई, लेकिन राज्यसभा में पारित होकर वह विधेयक फिर लटक गया। हालांकि कई राज्यों ने पंचायत स्तर के चुनावों में महिलाओं के लिए पचास फीसद तक आरक्षण लागू किया है, लेकिन इस मामले में संसद और विधानसभाओं की तस्वीर आज भी अधूरी है। देश के मुख्य राजनीतिक दल महिला आरक्षण के हक में बात जरूर करते हैं, लेकिन अपने ढांचे में महिलाओं को जगह और अधिकार की व्यवस्था करते नहीं दिखते। जबकि मौका मिलने पर महिलाओं ने हर बार खुद को अपने पुरुष समकक्षों से बेहतर साबित किया है। लेकिन इस मामले में तृणमूल कांग्रेस और बीजद ने अपनी पार्टी के स्तर पर पहल कर जो लाइन खींची है, उस ओर देर-सबेर बाकी दलों को भी बढ़ना पड़ेगा।

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