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संपादकीय: भुखमरी की जकड़

गौरतलब है कि वैश्विक स्तर पर जारी हुए ताजा भुखमरी सूचकांक, 2019 के आंकड़ों में भारत की स्थिति काफी चिंताजनक है।

Author Published on: October 18, 2019 1:45 AM
अफसोस की बात है कि विकास के ब्योरों में इस समस्या को पर्याप्त जगह नहीं मिल पाती।

किसी भी देश में आम नागरिकों की सेहत का स्तर यह बताता है कि वहां के विकास कार्यक्रमों में स्वास्थ्य के मुद्दे को कितनी प्राथमिकता मिल सकी है। लोगों की सेहत की स्थिति इस बात पर निर्भर है कि भरपेट और संतुलित भोजन तक उनकी कितनी पहुंच है। इस लिहाज से देखें तो विकास और अर्थव्यवस्था की रफ्तार बढ़ने के तमाम दावों के बीच भारत में अपेक्षित प्रगति संभव नहीं हो सकी है। गौरतलब है कि वैश्विक स्तर पर जारी हुए ताजा भुखमरी सूचकांक, 2019 के आंकड़ों में भारत की स्थिति काफी चिंताजनक है। दुनिया के एक सौ सत्रह देशों की सूची में भारत को एक सौ दो नंबर पर जगह मिल सकी है। जबकि पड़ोसी देश नेपाल, पाकिस्तान और बांग्लादेश को इस सूची में बेहतर जगह मिली है।

इससे यही पता चलता है कि हमारे यहां बेशक विकास को मुख्यधारा की राजनीति का मुद्दा बनाने में कामयाबी मिली है, लेकिन इसके बुनियादी पहलुओं को केंद्र में रख कर जरूरी कदम नहीं उठाए गए या उन पर अमल नहीं किया गया। यह बेवजह नहीं है कि नेपाल, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देश भी इस मामले में हमसे बेहतर स्थिति में पहुंच गए, जो अपनी बहुत सारी बुनियादी जरूरतों तक के लिए आमतौर पर भारत या फिर दूसरे देशों पर निर्भर रहते हैं।

यों ऐसे हालात लंबे समय से बने हुए हैं कि एक ओर रखरखाव के पर्याप्त इंतजाम और जरूरतमंदों तक पहुंच के अभाव में भारी पैमाने पर अनाज सड़ कर बर्बाद हो जाता है, दूसरी ओर देश में बड़ी तादाद ऐसे लोगों की है, जिन्हें पेट भरने लायक भोजन नहीं मिल पाता। इस मसले पर एक बार सुप्रीम कोर्ट को यहां तक कहना पड़ा था कि गोदामों में या उनके बाहर सड़ कर अनाज के बर्बाद होने से अच्छा है कि उसे गरीबों में मुफ्त बांट दिया जाए। लेकिन इस तल्ख रुख के बावजूद न सरकारों का रुख बदला, न इस मसले पर कोई नीतिगत पहलकदमी हुई।

आज भी नीतियों और व्यवस्थागत कमियों की वजह से भारी पैमाने पर अनाज की बर्बादी होती है और कहीं बहुत सारे लोगों की थाली में जरूरत भर भी भोजन नहीं पहुंच पाता। अफसोस की बात है कि विकास के ब्योरों में इस समस्या को पर्याप्त जगह नहीं मिल पाती। यही वजह है कि जब विकास की संपूर्ण तस्वीर का आकलन होता है, तो उसमें हमारा देश काफी पीछे खड़ा दिखता है, जबकि अर्थव्यवस्था के साथ-साथ अन्य कसौटियों पर अपेक्षया कमजोर माने वाले हमारे कुछ पड़ोसी देशों ने इस मसले पर एक निरंतरता की नीति अपनाई और अपनी स्थिति में सुधार किया।

इसमें कोई शक नहीं कि दावों के मुताबिक सतह पर विकास की चमक दिखती है। लेकिन सच यह है कि देश में होने वाली तरक्की का लाभ मुख्य रूप से एक छोटा तबका ही उठा पा रहा है और बाकी लोग हाशिये के बाहर ही रह जाते हैं। अगर गरीबी और अमीरी के बीच खाई चौड़ी हो रही है तो इसका मुख्य कारण विकास का एक छोटे दायरे में सिमटा होना है। हालांकि देश में भूख और कुपोषण की समस्या से लड़ने के लिए अनेक योजनाएं हैं और समय-समय पर इसके लिए अभियान भी चलाए जाते हैं, लेकिन अगर भुखमरी के सूचकांक में देश की स्थिति सुधरने के बजाय बिगड़ी है तो इससे साफ है कि या तो नीतिगत स्तर पर कोई बड़ी खामी है या फिर इस मसले से पार पाने में राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है।

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