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संपादकीय: आतंक का दायरा

श्रीलंका में हुए ताजा हमलों की प्रकृति से स्पष्ट है कि इसमें अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठनों की मिलीभगत है। छिपी बात नहीं है कि आइएसआइएस जैसे संगठन किस तरह दुनिया के तमाम देशों में इस्लामी कट्टरपंथ की जड़ें फैलाने में जुटे हुए हैं।

Author April 22, 2019 2:02 AM
चर्च के बाहर धमाके के बाद तैनात पुलिस। (Photo: ANI)

श्रीलंका में हुए बम धमाके आतंकवाद से लड़ने को प्रतिबद्ध विश्व बिरादरी के लिए एक नई चुनौती है। श्रीलंका के तीन गिरजाघरों, तीन पांच सितारा होटलों और दो अन्य जगहों पर हुए शृंखलाबद्ध बम धमाकों में अब तक दो सौ से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और साढ़े चार सौ से ऊपर घायल हैं। अभी तक इन हमलों की जिम्मेदारी किसी संगठन ने नहीं ली है। पर हमलों की प्रकृति को देखते हुए अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि इसमें शामिल संगठन का मकसद क्या था। हालांकि श्रीलंका लंबे समय तक गृहयुद्ध की चपेट में रहा है। वहां तमिल समुदाय के लोगों में जब-तब अपने प्रति भेदभाव का दंश उभरता रहा है। पर अब तमिल लिबरेशन टाइगर जैसे संगठन ऐसी स्थिति में नहीं हैं कि इतने बड़े स्तर पर सुनियोजित हमले कर सकें। ताजा घटना के बारे में श्रीलंका सरकार ने कहा है कि ये हमले धार्मिक कट्टरपंथी संगठन ने किए हैं। रविवार को ईस्टर का त्योहार था। चर्चों में ईस्टर का उत्सव चल रहा था। इसी तरह होटलों में आयोजन हो रहे थे। इन धमाकों में कई विदेशी नागरिक भी मारे गए हैं। इसे देखते हुए साफ है कि हमलावरों का निशाना ईसाई समुदाय के लोग थे। इसलिए स्वाभाविक ही शक की सुई अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय आतंकवादी संगठनों की तरफ जा रही है।

श्रीलंका में गृहयुद्ध समाप्त होने के बाद छिटपुट हिंसक झड़पें होती रही हैं। बहुसंख्यक सिंहली समुदाय के लोग वहां की मस्जिदों पर हमले करते रहे हैं। इसके चलते पिछले साल वहां आपातकाल भी लगाना पड़ा था। इस तरह यह आशंका हो सकती है कि वहां के अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों में अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों की टीस दबी होगी और वे इसके प्रतिकार की योजना बना रहे होंगे। पर ताजा हमलों में जितने बड़े पैमाने पर विस्फोटक और सुनियोजित रणनीति अपनाई गई है, वह सामान्य रूप से बदले की भावना की उपज नहीं हो सकती। श्रीलंका सरकार का कहना है कि सभी जगहों पर आत्मघाती हमले हुए। हालांकि अभी इन हमलों में इस्तेमाल किए गए विस्फोटकों की जांच बाकी है। पर यह सवाल अपनी जगह बना हुआ है कि इन आत्मघाती हमलावरों को साजो-सामान कहां से उपलब्ध हुआ होगा। उन्हें प्रशिक्षण कहां से मिला होगा। फिर किस तरह वे सुरक्षा एजेंसियों को चकमा देकर अपनी साजिशों को अंजाम देने में कामयाब हो गए। हालांकि श्रीलंका सरकार का कहना है कि इन हमलों की सूचना खुफिया एजेंसियों ने दी थी, पर जब तक काबू पाया जाता, तब तक विस्फोट हो गए। पर इससे उसके खुफिया और सुरक्षा इंतजामों की जवाबदेही पर सवाल समाप्त नहीं हो जाते।

श्रीलंका में हुए ताजा हमलों की प्रकृति से स्पष्ट है कि इसमें अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठनों की मिलीभगत है। छिपी बात नहीं है कि आइएसआइएस जैसे संगठन किस तरह दुनिया के तमाम देशों में इस्लामी कट्टरपंथ की जड़ें फैलाने में जुटे हुए हैं। खासकर जहां मुसलिम समुदाय पर अन्य समुदायों के हमले अधिक होते रहे हैं, वहां उनके लिए अपनी उपस्थिति बनाने में आसानी होती है। वे दुनिया के तमाम देशों में इसी तरह होटलों और भीड़भाड़ वाली जगहों पर आत्मघाती हमले कर चुनौती देते रहे हैं। श्रीलंका में भी इसी तरह उन्होंने घुसपैठ बनाई हो, तो हैरानी की बात नहीं। हालांकि पूरी स्थिति जांच के बात ही स्पष्ट होगी, पर स्पष्ट है कि यह आतंकवाद से लड़ने वाले राष्ट्रों के लिए यह बड़ी चुनौती है।

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